Loading...
#NewsBytesExplainer: सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान में हुए रक्षा समझौते के भारत के लिए क्या हैं मायने?
सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान में अहम रक्षा समझौता हुआ है

#NewsBytesExplainer: सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान में हुए रक्षा समझौते के भारत के लिए क्या हैं मायने?

लेखन आबिद खान
Aug 09, 2026
02:19 pm

क्या है खबर?

7 अगस्त को सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। ये एक त्रिपक्षीय समझौता है, जिसके तहत किसी भी एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। यह सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए रक्षा समझौते का ही विस्तार है, जिसमें अब NATO देश तुर्की को शामिल किया गया है। आइए जानते हैं भारत इस घटनाक्रम को कैसे देख रहा है।

समझौता

सबसे पहले समझौते के बारे में जानिए

समझौते के बारे में ज्यादा जानकारी सामने नहीं आई है। एक बड़ा प्रावधान ये है कि NATO की तरह किसी भी एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। यही वजह है कि इसे इस्लामिक NATO कहा जा रहा है।

इसके अलावा तीनों देश सामूहिक प्रतिरोध, संयुक्त सैन्य अभ्यास, खुफिया जानकारी साझा करने और रक्षा-औद्योगिक सहयोग पर ध्यान केंद्रित करेंगे।

इस समझौते को तीनों देश 'पूरी तरह से रक्षात्मक' बता रहे हैं।

भारत

भारत के लिए क्या है चिंता की बात?

ये समझौता दक्षिण एशिया में रणनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है। समझौते से पाकिस्तान को तुर्की के तेजी से बढ़ रहे रक्षा उद्योग तक पहुंच मिलेगी। खासतौर पर लड़ाकू ड्रोन, नौसैनिक युद्ध प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक युद्धक उपकरणों तक। 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान भी पाकिस्तान ने तुर्की के ड्रोनों का इस्तेमाल किया था।

हालांकि, भारत के सऊदी और तुर्की के साथ स्वतंत्र संबंध हैं, लेकिन क्षेत्रीय सैन्य तनाव बढ़ने की स्थिति में भारत के सामने स्थिति जटिल हो सकती है।

ADVERTISEMENT

कूटनीति

भारत की पश्चिम एशिया कूटनीति के सामने चुनौतियां

समझौते में शामिल होने के पीछे सऊदी का प्राथमिक उद्देश्य अपनी महत्वपूर्ण ऊर्जा संरचनाओं के लिए विश्वसनीय सैन्य सहायता प्राप्त करना है।

न्यूज18 के मुताबिक, पाकिस्तान समझौते का इस्तेमाल भारत के साथ अपने द्विपक्षीय विवादों को इस्लामी जगत के अंतर्गत लाकर बहुपक्षीय रूप देने के प्रयास के लिए कर सकता है। इससे एक कूटनीतिक तनाव पैदा हो सकता है, जिसे संभालना भारतीय विदेश नीति के लिए नई चुनौती होगी।

ADVERTISEMENT

विकल्प

भारत अपना सकता है ये रणनीति

भारत इस गठबंधन के असर को कम करने के लिए संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ओमान के साथ रणनीतिक, समुद्री और खुफिया सहयोग को गहरा कर सकता है, जिनकी सुरक्षा प्राथमिकताएं अलग हैं।

भारत तुर्की के बढ़ते भू-राजनीतिक प्रभाव को संतुलित करने के लिए फ्रांस, ग्रीस और साइप्रस के साथ सैन्य और राजनयिक साझेदारी को तेज कर सकता है।

भारत यह सुनिश्चित करना चाहेगा कि खाड़ी देश पाकिस्तान के राजनीतिक एजेंडे से आर्थिक संबंधों को अलग रखें।

मायने

भारत को उठाने होंगे ये कदम

फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को सऊदी के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को पाकिस्तान की बढ़ती स्थिति के दुष्प्रभाव से बचाना होगा।

भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि मक्का समझौता कश्मीर पर राजनयिक अलगाव या बहुपक्षीय मंचों पर सीमा पार आतंकवाद के नैरेटिव में न बदल जाए।

भारत को इजरायल और अरब देशों के साथ संबंधों को इस तरह से समायोजित करना होगा कि ये समझौता भारतीय हितों के खिलाफ कूटनीतिक मोर्चे में न बदले।

अन्य देशों

समझौते को चीन-रूस किस तरह देख रहे हैं?

चीन ने समझौते को लेकर कुछ नहीं कहा है। चीन के लिए एक स्थिर पाकिस्तान उसके बेल्ट एंड रोड परियोजना में अहम निवेश की रक्षा के लिए अहम है।

रूस ने भी सीधे कुछ नहीं कहा है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि रूस ईरान के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी और अमेरिका पर कम निर्भर खाड़ी देशों में अपने हितों के बीच संतुलन बनाते हुए तटस्थता के साथ स्थिति पर नजर रख रहा है।

ADVERTISEMENT