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FCRA विधेयक 2026: अमेरिकी आलोचना पर भारत का करारा जवाब, राजदूत क्वात्रा ने दूर किए भ्रम
अमेरिका में भारतीय राजदूत विनम मोहन क्वात्रा (बाएं) ने FCRA विधेयक 2026 पर अमेरिकी सांसद राइली (बाएं) की आपत्तियों पर करारा जवाब दिया है

FCRA विधेयक 2026: अमेरिकी आलोचना पर भारत का करारा जवाब, राजदूत क्वात्रा ने दूर किए भ्रम

Aug 10, 2026
11:16 am

क्या है खबर?

विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (FCRA), 2026 को लेकर चल रहे विवाद के बीच भारत ने अमेरिकी सांसदों की आपत्तियों को सिरे से खारिज कर दिया है। अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने सोशल मीडिया पर सिलसिलेवार पोस्ट साझा कर इस विधेयक पर 'मिथक बनाम वास्तविकता' को स्पष्ट किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विधेयक का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना और बेहतर सुशासन सुनिश्चित करना है। आइए पूरी खबर जानते हैं।

विधेयक

क्या है FCRA संशोधन विधेयक?

यह विधेयक 25 मार्च को लोकसभा में पेश किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य विदेशी अंशदान पर नजर रखना और देश की सुरक्षा को पुख्ता करना है।

यह विधेयक विदेशी अंशदान और परिसंपत्तियों के 'नामित प्राधिकरण' में निहित होने, पर्यवेक्षण, प्रबंधन और निपटान के लिए एक व्यापक ढांचा प्रदान करता है, जिसमें अस्थायी और स्थायी निहित होना शामिल है।

हालांकि, यह संशोधन विधेयक किसी भी पंजीकृत संस्थान को विदेशी अंशदान लेने से नहीं रोकता है।

चिंता

विधेयक पर क्या है अमेरिका की चिंता?

इस विधेयक पर अमेरिकी कांग्रेस और सीनेट के दोनों दलों के सांसदों ने चिंता जताई थी।

सीनेटर जेम्स रिश समेत कई सांसदों ने दावा किया कि इससे भारत में सक्रिय ईसाई संगठनों और नागरिक समाज समूहों पर बुरा असर पड़ेगा।

रिपब्लिकन पार्टी के सांसद राइली मूर का आरोप है कि यह विधेयक चर्चों और धार्मिक दान पर सरकारी कब्जे की अनुमति देता है। ऐसे में यह विधेयक भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों के लिए बड़ी चिंता का विषय है।

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स्पष्टता

राजदूत क्वात्रा ने विधेयक से जुड़ी भ्रांतियों को कैसे किया दूर?

क्वात्रा ने एक्स पर लिखा, 'FCRA 2026 को लेकर मीडिया और नागरिक समाज में कई गलतफहमियां हैं। यहां मिथक बनाम वास्तविकता की जांच प्रस्तुत है।'

उन्होंने विधेयक को भारत नागरिक समाज को मिलने वाली विदेशी सहायता को रोकने वाला होने के दावे को खारिज करते हुए लिखा, 'विधेयक में सार्वजनिक और राजनीतिक क्षेत्रों में विदेशी वित्तीय प्रवाह का विनियमन करने का प्रावधान राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं से प्रेरित एक संप्रभु कदम है और यह आवश्यक है।'

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उद्देश्य

अधिक पारदर्शिता, बेहतर शासन और स्पष्ट नियम है विधेयक का उद्देश्य

क्वात्रा ने लिखा, 'यह दुनिया भर के कई लोकतंत्रों में आधुनिक शासन की एक स्वीकृत विशेषता है। भारत में पहला FCRA 1976 में आया था। इसे 2010 में एक अधिक आधुनिक ढांचे से प्रतिस्थापित किया गया और 2016, 2018 और 2020 में संशोधनों द्वारा इसे और मजबूत किया गया।'

उन्होंने आगे लिखा, '2026 का विधेयक और नियम इसी दिशा में अगला कदम है और इसका उद्देश्य अधिक पारदर्शिता, बेहतर शासन और स्पष्ट नियम बनाना है।'

जानकारी

विधेयक भारतीयों को विदेशी दान प्राप्त करने से नहीं रोकता

क्वात्रा ने स्पष्ट किया, 'यह विधेयक भारतीयों को विदेशी दान प्राप्त करने से नहीं रोकता हैं। FCRA में हजारों संगठन पंजीकृत हैं और स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत, अनुसंधान और मानवीय कार्यों के लिए नियमित रूप से विदेशी धन प्राप्त करते हैं।'

सवाल

क्या NGO और धार्मिक समूहों का प्रभावित करता है FCRA?

क्वात्रा ने उन दावों को खारिज कर दिया कि FCRA ने गैर-सरकारी संगठनों (NGO) और धर्मार्थ समूहों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है और संशोधन सख्ती बढ़ाएगा।

उन्होंने लिखा, 'भारत में 30 लाख से ज्यादा NGO है और इनमें से 14,450 ही FCRA में पंजीकृत हैं। यह संशोधन किसी को भी विदेशी दान या मानवीय सहायता लेने से नहीं रोकता है, लेकिन पंजीकरण करने, निर्धारित प्रक्रिया से धन प्राप्त करने और उसका ब्यौरा देने के लिए बाध्य करता है।'

जब्ती

क्या संशोधन से विदेशी अंशदान पर निर्भर संगठनों की संपत्तियां जब्त होंगी?

क्वात्रा ने स्पष्ट किया कि यदि किसी NGO का रजिस्ट्रेशन रद्द होता है, तो विदेशी योगदान से बनी उसकी संपत्ति राज्य सरकार के पास चली जाएगी।

संशोधन में इस संपत्ति की सुरक्षा के लिए 'नामित प्राधिकरण' बनाया गया है। NGO के रजिस्ट्रेशन बहाल कराने पर उसकी सभी संपत्तियां उसे वापस सौंप दी जाएगी।

इसी तरह किसी धार्मिक संस्था का रजिस्ट्रेशन रद्द होने पर उसकी संपत्ति उसी धर्म के किसी अन्य FCRA-पंजीकृत संगठन को स्थानांतरित की जाएगी।

लक्षित

क्या FCRA संशोधन किसी विशेष धर्म या समुदाय को लक्षित करता है?

क्वात्रा ने स्पष्ट किया कि FCRA संशोधन किसी विशेष धर्म या समुदाय को लक्षित नहीं करता है। यह सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होता है।

धार्मिक कल्याणकारी गतिविधियां, धार्मिक शिक्षा, पूजा स्थलों का रखरखाव और हर धर्म के संगठनों द्वारा किए जाने वाले धर्मार्थ कार्य विदेशी वित्त पोषण के लिए पात्र बने रहेंगे।

उन्होंने साफ किया कि इस विधेयक में आने वाले संगठनों को पंजीकरण करना होगा और निर्धारित बैंकिंग, लेखांकन और रिपोर्टिंग आवश्यकताओं का अनुपालन करना होगा।

अपवाद

क्या भारत ही है इस तरह के कानून बनाने वाला देश?

क्वात्रा ने इस धारणा को भी खारिज कर दिया कि भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपवाद है।

उन्होंने 1938 में लाए गए अमेरिकी विदेशी एजेंट पंजीकरण अधिनियम और 2010 के विदेशी खाता कर अनुपालन अधिनियम के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया द्वारा 2018 में और कनाडा द्वारा 2024 में अपनाए गए कानूनों का भी हवाला दिया।

उन्होंने कहा कि ब्रिटेन की योजना जुलाई 2025 में लागू हुई, जबकि यूरोपीय संघ इस संबंध में कानून बनाने पर विचार कर रहा है।

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