#NewsBytesExplainer: क्या अमेरिका के दबाव में भारत चाबहार बंदरगाह से बाहर निकला, ये कितना बड़ा नुकसान?
क्या है खबर?
हाल ही में एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि अमेरिका के दबाव के बाद भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह से खुद को पीछे खींच लिया है। इससे देश में राजनीतिक खींचतान भी शुरू हो गई है। कांग्रेस ने सरकार पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आगे आत्मसमर्पण करने का आरोप लगाया है। मामले के तूल पकड़ने के बाद विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्टीकरण जारी किया है। आइए पूरा मामला समझते हैं।
रिपोर्ट
रिपोर्ट में क्या दावा किया गया है?
15 जनवरी को द इकोनॉमिक टाइम्स ने एक रिपोर्ट में कहा था कि चाबहार बंदरगाह के विकास में भारत की भागीदारी तब खत्म हो गई, जब ट्रंप ने ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने का ऐलान किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि चाबहार के लिए मौजूदा प्रतिबंध छूट अप्रैल, 2026 में समाप्त होने वाली थी। इन प्रतिबंधों ने भारत द्वारा बंदरगाह के दीर्घकालिक संचालन को लेकर अनिश्चितता पैदा कर दी है।
सरकार
सरकार का क्या कहना है?
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इन आरोपों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि ईरान के चाबहार बंदरगाह से जुड़ी योजनाएं जारी हैं और इन्हें आगे बढ़ाने के लिए भारत अमेरिका से बातचीत कर रहा है। अमेरिका ने भारत को ईरान पर लगे प्रतिबंधों के बावजूद चाबहार बंदरगाह से जुड़े काम जारी रखने के लिए एक छूट दी है, जो 26 अप्रैल, 2026 को खत्म हो रही है।
विकल्प
किन विकल्पों पर विचार कर रही है सरकार?
हिंदुस्तान टाइम्स ने सूत्रों के हवाले से बताया कि सरकार ने अपनी संस्थाओं और अधिकारियों को प्रतिबंधों के प्रभाव से बचाने के लिए कई कदम उठाए हैं। इसी के चलते इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड के बोर्ड में कार्यरत सभी सरकारी अधिकारियों ने पदों से इस्तीफा दे दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि शाहिद बेहेश्टी टर्मिनल पर संचालन के लिए एक ऐसी इकाई के गठन पर विचार किया जा रहा है, जो प्रतिबंधों के दायरे में न आए।
प्रतिबंध
अमेरिका ने क्यों लगाया है प्रतिबंध?
दरअसल, 2018 में अमेरिका ने चाबहार को अफगानिस्तान की मदद और विकास के लिए छूट दी थी। हालांकि, सितंबर, 2025 में इस छूट को खत्म करने का ऐलान किया था। अमेरिका का कहना है कि अब अफगानिस्तान में तालिबानी शासन है और बंदरगाह के संचालन से ईरान फायदा उठा रहा है। अमेरिका ने कहा था कि अब से जो लोग बंदरगाह को चलाने, पैसे देने या उससे जुड़े किसी काम में शामिल होंगे, वे अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में होंगे।
अहमियत
भारत के लिए कितना अहम चाबहार बंदरगाह?
भारत के लिए चाबहार रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। यह पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए सीधा रास्ता प्रदान करता है। यह अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का भी एक प्रमुख केंद्र है, जो भारत को रूस और यूरोप से जोड़ता है। भारत यहां से सामान सीधा अफगानिस्तान और मध्य एशिया भेज सकता है। ये पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के नजदीक है, इसलिए इसे चीन-पाकिस्तान के गठबंधन का जवाब माना जाता है।
विशेषज्ञ
क्या कह रहे हैं विशेषज्ञ?
पूर्व विदेश सचिव कंवल सिबल ने तर्क दिया कि चाबहार पर अमेरिकी प्रतिबंध ईरान की तुलना में भारत को ज्यादा नुकसान पहुंचाएंगे। उन्होंने लिखा, 'चाबहार एक कनेक्टिविटी परियोजना है, जो भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच प्रदान करती है। ईरान को इन दोनों तक पहुंच के लिए चाबहार की जरूरत नहीं है। इससे चीन को इस परियोजना में भारत की जगह लेने का रास्ता खुल जाएगा।' उन्होंने कहा कि चाबहार में भारत का वास्तविक वित्तीय निवेश मामूली है।
विकास
भारत ने 10 साल के लिए लीज पर लिया है चाबहार बंदरगा
चाबहार बंदरगाह को भारत और ईरान मिलकर विकसित कर रहे हैं। भारत ने 2024 में चाबहार को 10 साल के लिए लीज पर लिया है। इसके तहत भारत यहां करीब 1,000 करोड़ रुपये का निवेश करेगा और 2,200 करोड़ रुपये का कर्ज देगा। चाबहार बंदरगाह को लेकर भारत और ईरान के बीच 2003 से बातचीत चल रही है। 2003 में ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति मुहम्मद खतामी ने भारत यात्रा की थी। इस दौरान समझौते पर सहमति बनी थी।