क्या अपशब्दों का इस्तेमाल करने पर हो सकती है जेल, क्या कहता है कानून?
क्या है खबर?
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए हालिया विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित तौर पर अपशब्द, अश्लील और अपमानजनक टिप्पणी करने का मामला सामने आया है। इस संबंध में एक 25 वर्षीय महिला के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। इसके बाद बहस छिड़ गई है कि क्या भारतीय कानून के तहत अपशब्दों का इस्तेमाल करना दंडनीय अपराध है। आइए समझते हैं क्या ऐसे मामले में जेल की सजा हो सकती है।
कानून
क्या कहता है कानून?
भारतीय न्याय संहिता (BNS) में ऐसा अलग प्रावधान नहीं है, जो हर तरह की अपशब्द को अपराध घोषित करता हो। अपशब्दों का इस्तेमाल अपराध है या नहीं, यह कृत्य के संदर्भ, इरादे और परिणामों पर निर्भर करता है।
ऐसे मामलों में BNS की धारा 352 लागू हो सकती है, शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करने से संबंधित है।
इसके तहत दोषी व्यक्ति को 2 साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों का सामना करना पड़ सकता है।
धमकी
अपशब्दों के साथ धमकी देने पर हो सकती है 7 साल की सजा
अगर अपशब्दों का इस्तेमाल किसी व्यक्ति के जीवन, प्रतिष्ठा या संपत्ति को धमकी देने के साथ किया जाता है, तो ऐसे मामलों में धारा 351 के तहत अपराध बनता है।
इसमें किसी व्यक्ति को डराने या किसी को कुछ करने या न करने के लिए मजबूर करने के इरादे से दी गई धमकियों को शामिल किया गया है।
इसमें दोषी पाए जाने पर 2 साल से लेकर 7 साल तक की कैद हो सकती है।
धारा 296
धारा 296 का भी होता है इस्तेमाल
ऐसे विवादों में सबसे ज्यादा BNS की धारा 296 का इस्तेमाल किया जाता है।
इसमें कहा गया है कि जो कोई भी दूसरों को परेशान करने के इरादे से किसी सार्वजनिक जगह पर कोई अश्लील हरकत करता है या किसी सार्वजनिक जगह पर या उसके आसपास कोई अश्लील गाना, कहानी या शब्द गाता, सुनाता या बोलता है तो उसे 3 महीने तक की जेल हो सकती है।
सार्वजनिक जगहों पर अभद्रता के मामले आमतौर पर इसी धारा में आते हैं।
कानूनी चुनौतियां
सामने हैं कई कानूनी चुनौतियां
ऐसे मामलों में केवल अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल ही अपराध नहीं माना जाता। यह भी मायने रखता है कि अपमानजनक शब्दों का प्रयोग क्या हिंसा, अव्यवस्था या शांति भंग को भड़काने के उद्देश्य से किया गया था।
आमतौर पर कोर्ट भी अभद्र या आपत्तिजनक टिप्पणियों और जानबूझकर किए गए अपमान और धमकियों में अंतर स्पष्ट करता आया है।
पुलिस को साबित करना होता है कि शब्दों का उद्देश्य हिंसा, सार्वजनिक अव्यवस्था या किसी अन्य अपराध को भड़काना था।
कोर्ट
ऐसे मामलों में कोर्ट का क्या रुख है?
सितंबर 2025 में तेलंगाना हाई कोर्ट ने कहा था कि सोशल मीडिया पर किसी राजनीतिक पार्टी को 'कीड़ा' कहना भले ही कठोर या भद्दी भाषा हो, लेकिन अगर इससे सार्वजनिक व्यवस्था को कोई खतरा नहीं है, तो धारा 352 या 353 लागू नहीं हो सकती।
कोर्ट ने कहा था कि ज्यादा से ज्यादा यह मानहानि के 'सीमित दायरे' में आ सकता है और मानहानि के मामलों में भी राजनीतिक भाषणों को संवैधानिक सुरक्षा मिली हुई है।