बॉम्बे हाई कोर्ट ने गैर-कानूनी गिरफ्तारी पर नाराजगी जताई, पुलिस और मजिस्ट्रेट पर होगी कार्रवाई
क्या है खबर?
महाराष्ट्र की बॉम्बे हाई कोर्ट ने जबरन वसूली से जुड़े एक झूठे मामले में मुंबई के एक व्यवसायी को फंसाने पर कड़ी नाराजगी जताई है। न्यायमूर्ति एएस गडकरी और कमल खता की पीठ ने याचिकाकर्ता बिपिन सतीश चंद्र अग्रवाल की गिरफ्तारी को गैर-कानूनी बताया और राज्य सरकार को फटकार लगाई। कोर्ट ने अग्रवाल को 26 हिरासत में रखने पर महाराष्ट्र सरकार पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है, जो उसे अग्रवाल को मुआवजे के रूप में देना होगा।
मामला
क्या है मामला?
अग्रवाल अपनी बुज़ुर्ग सास के लिए पावर ऑफ अटॉर्नी होल्डर के तौर पर सेठ और सोनल डेवलपर्स के साथ एक सोसाइटी के पुनर्विकास शर्तों पर बातचीत करने गए थे।
जब डेवलपर्स ने उन्हें अग्रिम भुगतान के तौर पर 2 लाख रुपये दिए, तो पुलिस ने उन्हें हथकड़ी लगा दी और जबरन वसूली के लिए FIR दर्ज की।
अग्रवाल ने अपनी गिरफ्तारी को गैर-कानूनी घोषित करने, पुलिसवालों के खिलाफ जांच करने और मुआवजा की मांग को लेकर याचिका दायर की थी।
आदेश
पुलिस और मजिस्ट्रेट के खिलाफ भी आदेश
कोर्ट ने बिना जांच के व्यवसायी को गिरफ्तार करने पर दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने, उनकी सैलरी से मुआवजा वसूलने का भी आदेश दिया।
कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को हिरासत लेने का आदेश देने वाले 64वें मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के खिलाफ कार्रवाई के बारे में हाई कोर्ट प्रशासनिक समिति के सामने फैसला रखे।
कोर्ट ने कहा कि विद्वान मजिस्ट्रेट भी याचिकाकर्ता को गलत तरीके से हिरासत में रखने के लिए जिम्मेदार थे।
बयान
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता अग्रवाल का बैकग्राउंड साफ होने के बावजूद, पुलिस रिकॉर्ड में उसे गलत तरीके से आदतन अपराधी बताया गया, जिसके फरार होने की संभावना थी।
कोर्ट ने कहा, "पुलिस ने बिना किसी सबूत और जांच किए याचिकाकर्ता को कोई गैंगस्टर, हिस्ट्री-शीटर या जबरन वसूली करने वाला बताने की कोशिश की है। कोई पुलिस ऑफिसर सिर्फ सवाल पूछने के लिए किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकता और उसे यह भी लिखना होगा कि हिरासत क्यों जरूरी है।"