लोगों को सरकार का गुलाम बनाया जा रहा, बॉम्बे हाई कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा?
क्या है खबर?
बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार के फैसलों का विरोध करना या उसके खिलाफ नारेबाजी करना किसी नागरिक को किसी क्षेत्र से निकालने का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट की ये टिप्पणी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के राज्य महासचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी के खिलाफ जारी निष्कासन आदेश को लेकर आई है। कोर्ट ने कहा कि नागरिकों को सरकार के फेसलों के खिलाफ विरोध और आंदोलन करने का अधिकार है।
मामला
क्या है मामला?
दरअसल, चौधरी लगातार सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेते रहे हैं। इसे लेकर उनके खिलाफ कई FIR दर्ज की गई थी। इन्हीं FIR के आधार पर अक्टूबर, 2025 में उनके खिलाफ मुंबई पुलिस ने निष्कासन की कार्यवाही शुरू की। उन्हें मुंबई छोड़ने और 12 महीने तक शहर और आसपास के क्षेत्रों से बाहर रहने का आदेश जारी किया गया। चौधरी ने इसी साल 27 मार्च को इस आदेश को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
टिप्पणी
"भाजपा सरकार मुर्दाबाद का नारा निष्कासन का आधार कैसे?"
कोर्ट ने पूछा कि 'भाजपा सरकार मुर्दाबाद' और 'अमित शाह मुर्दाबाद' जैसे नारे कार्रवाई का आधार कैसे बन सकते हैं। न्यायमूर्ति माधव जामदार ने कहा, "नागरिकों को केंद्र सरकार का गुलाम नहीं बनाया जा सकता। पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नौकर नहीं है। वे लोक सेवक हैं। सिर्फ विरोध प्रदर्शन करने या नारे लगाने पर पुलिस किसी व्यक्ति को उसके अपने शहर से बाहर करने का आदेश नहीं दे सकती।"
कोर्ट
कोर्ट ने पूछा- विरोध करने पर क्या मामला दर्ज करेंगे?
लाइव लॉ के अनुसार, जस्टिस जामदार ने पूछा, "यह क्या हो रहा है? सभी नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है। वे विरोध प्रदर्शन नहीं कर सकते, आंदोलन नहीं कर सकते, यह सब क्या है? अब इतने पेपर लीक हो चुके हैं। अगर लोग विरोध करें, तो आप उनके खिलाफ मामला दर्ज कर देंगे? विरोध करना नागरिकों का अधिकार है। क्या वे ऐसे नारे भी नहीं लगा सकते?"
अहम टिप्पणियां
हाई कोर्ट की टिप्पणी की बड़ी बातें
-क्या ये मामले उनके खिलाफ इसलिए दर्ज किए गए हैं क्योंकि वे दूसरी पार्टी से हैं? उन्हें भी पाला बदलने दीजिए, ऐसे सभी मामले खत्म हो जाएंगे। देशभर में विधायकों की खरीद-फरोख्त हो रही है। -याचिकाकर्ता सरकार की 'वॉशिंग मशीन' से अपने खिलाफ FIR को हटाने के लिए राजनीतिक पक्ष बदल सकता है। -चौधरी के खिलाफ की गई कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण थी और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती थी।
SDPI
SDPI ने फैसले को ऐतिहासिक बताया
SDPI ने कहा, "महाराष्ट्र सरकार के आदेश को रद्द करने का बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला संविधान और लोकतांत्रिक अधिकारों की एक ऐतिहासिक जीत है। उनका कथित 'अपराध' सिर्फ इतना था कि उन्होंने अहम सार्वजनिक सवालों पर लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों में सक्रिय भूमिका निभाई। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना और सरकारी नीतियों के खिलाफ नारे लगाना संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत संरक्षित अधिकार हैं।"