इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम आदेश- सरकारी घर भी नहीं रोक पाएगा पत्नी का गुजारा भत्ता
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने साफ किया है कि सरकारी मकान मिलने भर से कोई महिला आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हो जाती, इसलिए उसे गुजारा भत्ता मिलना चाहिए। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस पुराने आदेश को सही ठहराया है, जिसमें पति को गुजारा भत्ता देने को कहा गया था। इस फैसले के बाद अब पति को अपनी पत्नी को हर महीने 4,000 रुपये देने होंगे। यह रकम उस तारीख से गिनी जाएगी जब पत्नी ने याचिका दायर की थी। वहीं, कोर्ट के आदेश की तारीख से पति को हर महीने 5,000 रुपये का भुगतान करना होगा। कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ सिर छिपाने को जगह मिल जाने से पति की वित्तीय जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।
कोर्ट को पति की कमाई का कोई पक्का सबूत नहीं मिला
पति ने अपनी दलील में कहा था कि उसकी पत्नी सिलाई-कढ़ाई करके कुछ कमाती है और वह सरकारी मकान में रहती है, इसलिए उसे गुजारा भत्ता नहीं मिलना चाहिए। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को नहीं माना। कोर्ट को सिलाई-कढ़ाई से होने वाली किसी भी पक्की कमाई का कोई सबूत नहीं मिला। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि सिर्फ मकान मिल जाने से कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से सुरक्षित नहीं हो जाता। पति ने खुद को बेरोजगार बताया था, लेकिन कोर्ट ने इस दावे को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पति एक ड्राइवर है और उसके पास वाहन चलाने का हुनर है, इसलिए उसे बेरोजगार नहीं माना जा सकता। आखिर में, कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि पत्नी को सिर्फ रहने के लिए जगह देना उसकी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी की जगह नहीं ले सकता।