16 साल बाद मिला न्याय, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शहीद की पत्नी को विधवा को माना
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उस महिला को सेना के जवान की वैध विधवा माना है, जो 2008 में एक आतंकवादी मुठभेड़ में शहीद हुए थे। जवान के माता-पिता ने महिला के विधवा होने के दावे को चुनौती देते हुए कहा था कि उनके बेटे की तो सिर्फ सगाई हुई थी, शादी नहीं। लेकिन, अदालत को साफ सबूत मिले, जिनसे पता चला कि 12 मई 2007 को असल में शादी हुई थी।
निमंत्रण और गवाहों ने जवान की शादी साबित की
शादी का निमंत्रण पत्र और गवाहों के बयान जैसे अहम सबूत महिला के दावों को सही साबित करने के लिए काफी थे। माता-पिता ने दलील दी थी कि यह सिर्फ सगाई थी और असली शादी बाद में होने वाली थी, लेकिन रिकॉर्ड्स से पता चला कि जवान ने उसी तारीख को शादी करने के लिए ही छुट्टी ली थी।
अदालत को माता-पिता की कहानी में कई खामियां भी मिलीं, जिसमें जवान की मां की पहले की एक स्वीकारोक्ति भी शामिल थी। उम्र से जुड़ी दलीलों को अदालत ने इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि ये बातें पहले कभी उठाई ही नहीं गई थीं। आखिर में, दोनों अदालतों ने इस बात की पुष्टि की कि महिला ही जवान की कानूनी विधवा है।