छत्तीसगढ़ का गौरव 'पंडवानी क्वीन' तीजन बाई कौन थीं, जिन्हें प्रधानमंत्री मोदी ने भी किया नमन?
क्या है खबर?
छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक कला 'पंडवानी' को दुनियाभर के मंचों पर पहुंचाने वाली पद्म विभूषण डॉ तीजन बाई का निधन हो गया है। उनके जाने से कला और संस्कृति जगत का एक महान युग समाप्त हो गया है, जिससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत पूरा देश शोक में है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि पुरुषों के वर्चस्व वाली इस विधा में अपनी अलग पहचान बनाने वाली तीजन बाई आखिर कौन थीं? आइए जानें उनकी अनूठी विरासत की पूरी कहानी।
शुरुआत
बचपन में कैसे शुरू हुआ तीजन बाई का पंडवानी सफर?
साल 1956 में छत्तीसगढ़ के भिलाई के पास गनियारी गांव में जन्मीं तीजन बाई पारधी अनुसूचित जनजाति से थीं और 5 भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं। पंडवानी से उनका जुड़ाव बचपन में ही शुरू हो गया था। वो अपने नाना बृजलाल पारधी से छत्तीसगढ़ी लेखक सबल सिंह चौहान की रचित महाभारत सुनती थीं। नाना की संगत और महाभारत की वीरगाथाओं ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने इसके कई प्रसंग और श्लोक जुबानी याद कर लिए।
पहली कमाई
सिर्फ 10 रुपये की पहली कमाई से शुरू हुआ था सफर
उमेद सिंह देशमुख से पंडवानी की बारीकियां सीखने के बाद तीजन बाई इस लोककला में पारंगत हो गईं। महज 13 साल की उम्र में उन्होंने पड़ोसी गांव चंद्रखुरी में अपनी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी। इस ऐतिहासिक कार्यक्रम के लिए उन्हें मेहनताना के रूप में सिर्फ 10 रुपये मिले थे। यही छोटी-सी पहली कमाई उनके असाधारण सफर की शुरुआत बनी, जिसने उन्हें आगे चलकर देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के प्रतिष्ठित मंचों तक पहुंचा दिया।
परंपरा
...जब तीजन बाई ने सदियों पुरानी परंपरा तोड़कर 'खड़े होकर' गाई महाभारत
चंद्रखुरी में तीजन की पहली प्रस्तुति इसलिए ऐतिहासिक बनी, क्योंकि उन्होंने पंडवानी की 'कापालिक शैली' में खड़े होकर गायन किया। इस परंपरा में इससे पहले किसी भी महिला ने ऐसा नहीं किया था। उस दौर में महिलाएं केवल बैठकर गाई जाने वाली 'वेदमती शैली' तक ही सीमित थीं। तीजन बाई ने इस परंपरा को तोड़ते हुए बुलंद आवाज में प्रस्तुति दी। उनके इस साहसिक कदम ने पुरुष-प्रधान मानी जाने वाली इस लोककला में महिलाओं के लिए नए रास्ते खोल दिए।
मील का पत्थर
हबीब तनवीर की पारखी नजर और इंदिरा गांधी के सामने वो एक परफॉर्मेंस
तीजन बाई की अद्भुत प्रतिभा की चर्चा जल्द ही दूर-दूर तक फैल गई। उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब मशहूर रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उनकी कला को पहचानकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने प्रस्तुति का अवसर दिलाया। बस यहीं से उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। बाद में उन्होंने श्याम बेनेगल के चर्चित दूरदर्शन धारावाहिक 'भारत एक खोज' में महाभारत के प्रसंगों की प्रभावशाली प्रस्तुति देकर अपनी कला का लोहा मनवाया।
उपलब्धि
तंबूरे के दम पर जीत ली दुनिया
1980 के दशक से तीजन बाई ने इंग्लैंड, फ्रांस और जर्मनी सहित कई देशों में भारतीय लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया। उनका शुरुआती जीवन संघर्षों से भरा रहा। महज 12 साल की उम्र में शादी और महिला होकर पंडवानी गाने के कारण उन्हें अपने ही पारधी समाज से निष्कासित होना पड़ा। प्रस्तुति के दौरान वो तंबूरे को कभी भीम की गदा तो कभी अर्जुन का धनुष बनाकर अभिनय करती थीं। 'द्रौपदी चीरहरण' और 'दुशासन वध' उनकी सबसे चर्चित प्रस्तुतियां रहीं।
जानकारी
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजी गईं तीजन बाई
तीजन बाई को लंबे करियर में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिले, जिनमें पद्मश्री (1988), पद्म भूषण (2003) और पद्म विभूषण (2019) शामिल हैं। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995), फुकुओका पुरस्कार (2018) और बिलासपुर विश्वविद्यालय से मानद डी.लिट् की उपाधि भी मिली।