LOADING...
'घूसखोर पंडित' मामले पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश- माध्यम कोई भी हो, अपमान बर्दाश्त नहीं
'घूसखोर पंडित' मामले में सुप्रीम कोर्ट का कड़ा संदेश

'घूसखोर पंडित' मामले पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश- माध्यम कोई भी हो, अपमान बर्दाश्त नहीं

Feb 25, 2026
03:01 pm

क्या है खबर?

सार्वजनिक मंचों से नफरत फैलाने और विवादित बयानबाजी करने वालों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा प्रहार किया है। मनोज बाजपेयी की फिल्म 'घूसखोर पंडित' (पूर्व प्रस्तावित शीर्षक) से जुड़े मामले में विस्तृत फैसला सुनाते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी समुदाय को अपमानित करना संविधान का उल्लंघन है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल किसी समूह को नीचा दिखाने या उसका मजाक उड़ाने के लिए नहीं किया जा सकता।

फैसला

किसी भी समुदाय को नीचा दिखाना संवैधानिक रूप से वर्जित- कोर्ट

'घूसखोर पंडित' से जुड़े विवाद में कोर्ट का विस्तृत फैसला सार्वजनिक हो गया है, जिसमें साफ कहा गया है कि किसी भी समुदाय को बदनाम करना या उसे नीचा दिखाना भारतीय संविधान का उल्लंघन है। जज उज्जल भुइयां ने अपने फैसले में कहा कि चाहे भाषण हो, मीम हो, कोई कार्टून हो, फिल्म हो या विजुअल आर्ट, अगर उसके जरिए किसी धर्म, जाति या भाषाई समुदाय की गरिमा को ठेस पहुंचाई जाती है तो वो 'संवैधानिक रूप से वर्जित' है।

सम्मान पर जोर

कोर्ट ने कहा- पदाधिकारी और आम नागरिक दोनों को समाज का सम्मान करना अनिवार्य

ये टिप्पणी उस मामले के संदर्भ में आई है, जिसमें कोर्ट ने 5 दिन पहले ही फिल्म निर्माताओं को इसका विवादित शीर्षक बदलने का आदेश दिया था। जज ने कहा कि भारतीय संविधान में 'भाईचारा' एक मौलिक मूल्य है। राज्य या किसी भी व्यक्ति को समाज के किसी हिस्से को 'विलेन' की तरह पेश करने का अधिकार नहीं। कोर्ट ने याद दिलाया कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों और आम नागरिकों, दोनों को ही मर्यादा का पालन करना अनिवार्य है।

Advertisement

अनावश्यक रोक

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- कला और फिल्म पर अनावश्यक रोक नहीं लगेगी

अदालत ने कहा कि भले ही फिल्म निर्माताओं ने विवादित शीर्षक वापस ले लिया हो, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक सौहार्द का संतुलन स्पष्ट करना जरूरी था। फिल्म, व्यंग्य, कविता या कला को सिर्फ आपत्ति के कारण नहीं रोका जा सकता। इसका मूल्यांकन 'समझदार और तर्कसंगत दर्शक' की दृष्टि से होना चाहिए, ना कि अत्यधिक संवेदनशील व्यक्तियों के अनुसार। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेंसर बोर्ड से प्रमाणित हो चुकीं फिल्मों में कोर्ट आमतौर पर दखल नहीं देगा।

Advertisement

दो टूक

मजाक या अपमान के लिए अभिव्यक्ति की आजादी नहीं

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जो सिद्धांत हैं, वो फिल्म के शीर्षक पर भी समान रूप से लागू होते हैं। चाहे वो कोई बड़ा राजनेता हो, कलाकार हो या आम नागरिक, किसी भी माध्यम से किसी खास समूह या समुदाय को निशाना बनाना, उसका मजाक उड़ाना या उसे अपमानित करना भारतीय संविधान का सीधा उल्लंघन है। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी का उपयोग नफरत फैलाने के लिए नहीं किया जा सकता।

Advertisement