भारतीय डाटा सेंटर्स में विदेशी निवेश 90 फीसदी लुढ़का, जानिए क्या है वजह
जून से भारत के डाटा सेंटर्स में आने वाला विदेशी निवेश तेजी से घटा है। पहले जहां हर महीने 60 से 90 करोड़ डॉलर (करीब 5,700-8,500 करोड़ रुपये) का निवेश आता था, लेकिन अब केवल 10 करोड़ डॉलर (करीब 900 करोड़ रुपये) ही आ रहा है। जुलाई में आखिरी बड़ा निवेश 13 करोड़ डॉलर (करीब 1,200 करोड़ रुपये) का था और अगस्त में एक भी निवेश नहीं मिला।
इस गिरावट की वजह ठाणे के बाल्कुम में अमेजन वेब सर्विसेज (AWS) के डाटा सेंटर को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन और विशाखापट्टनम के निवासियों की चिंताएं हैं।
वहां के स्थानीय लोग इन डाटा सेंटर परियोजनाओं की वजह से अधिक पानी के इस्तेमाल, बिजली की कमी, शोरगुल और नियमों के पालन में खामियों को लेकर चिंतित हैं।
सेंटर्स में पारदर्शिता की मांग कर रहे निवेशक
इन शहरों के लोग डाटा सेंटर्स के पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को लेकर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि परियोजनाएं शुरू करने से पहले नियामक और अनुपालन प्रक्रियाओं में अधिक पारदर्शिता होनी चाहिए।
यही वजह है कि निवेशक अब चाहते हैं कि डाटा सेंटर संचालक खुले तौर पर जानकारी दें कि वे कितना पानी और बिजली का इस्तेमाल करते हैं और पर्यावरण को बचाने के लिए क्या उपाय कर रहे हैं।
हालांकि, निवेश में कमी के बावजूद उद्योग के दिग्गज सुनील गुप्ता कहते हैं कि डाटा सेंटर्स की मांग में कोई कमी नहीं आई है। सेंटर संचालक पहले से ही रिन्यूएबल एनर्जी (नवीकरणीय ऊर्जा) आधारित बिजली सिस्टम्स, एडवांस लिक्विड और इमर्शन कूलिंग तकनीकों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित ऊर्जा अनुकूलन जैसी आधुनिक तकनीकों को अपना रहे हैं।