क्या है E100 फ्यूल, जिसे सरकार ने दी है मंजूरी? जानिए इसके फायदे-नुकसान
क्या है खबर?
केंद्र सरकार ने हाल ही में वाहनों में E100 फ्यूल के इस्तेमाल की आधिकारिक मंजूरी दे दी है। इस कदम से देश ने कच्चे तेल के आयात में कटौती करने की दिशा में लंबी छलांग लगाई है। इसके बाद से लोगों के बीच E100 फ्यूल को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। उनके बीच यह ईंधन है क्या है? इसके फायदे-नुकसान क्या हैं? जैसे कई सवाल खड़े हो रहे हैं। आइए जानते हैं इसका वाहन चालकों पर क्या असर पड़ेगा।
E100
क्या है E100 फ्यूल?
E100 एक ऐसा ईंधन है, जिसमें लगभग 100 प्रतिशत इथेनॉल होता है और इसमें पारंपरिक पेट्रोल बिल्कुल नहीं होता। इथेनॉल एक रिन्यूएबल बायोफ्यूल है, जो खेती से मिलने वाले कच्चे माल- गन्ना, मक्का, खराब अनाज और खेती के कचरे के फर्मेंटेशन और डिस्टिलेशन से बनाया जाता है। यह 100 फीसदी शुद्ध इथेनॉल नहीं होता है। इसमें आमतौर पर 93-95 फीसदी एनहाइड्रस (बिना पानी वाला) इथेनॉल होता है, जिसमें 5-7 फीसदी पेट्रोल और को-सॉल्वेंट्स मिलाए जाते हैं, ताकि यह जमे नहीं।
आर्थिक फायदा
देश और वाहन चालक दोनों का बचेगा पैसा
इथेनॉल मिश्रित प्रोग्राम को खास तौर पर इसलिए शुरू किया गया था, जिससे पारंपरिक पेट्रोल पर भारत की निर्भरता को कम किया जा सके। इसलिए, ज्यादा इथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन से देश को कच्चे तेल का आयात कम करने और विदेशा मुद्रा बचाने में मदद मिलेगी। इसके अलावा, किसानों के लिए कमाई के साधन बनेंगे और कृषि अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा। बताया जा रहा है कि इसकी कीमत पेट्रोल से कम होगी, जिससे वाहन चलाना सस्ता हो सकता है।
पर्यावरण
वाहनों से कम होगा प्रदूषण
इथेनॉल के आर्थिक फायदे ही नहीं है, बल्कि इसके पर्यावरण को भी फायदे हैं, जो देश को उसके स्थिरता लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करेंगे। यह खेती के अवशिष्ट से बनाया जाता है, जिससे कचरे में कमी आएगी। इसके अवाला, यह पेट्रोल की तुलना में ज्यादा स्वच्छ जलता है, जिससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होगा। इससे प्रदूषण कम फैलेगा तो पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा क्योंकि प्रदूषण में वाहनों का धुआं सबसे बड़ा कारक है।
नुकसान
क्या हैं इसके नुकसान?
यह स्वभाव से हाइग्रोस्कोपिक होता है और पुरानी गाड़ियों में इसका इस्तेमाल करने से ऐसा नुकसान होगा, जिसे ठीक नहीं किया जा सकता। E100 का इस्तेमाल करने के लिए खास रूप से ट्यून किए गए इंजन की जरूरत होती है और फिलहाल भारत में ऐसी गाड़ियां नहीं हैं। इसका ऊर्जा घनत्व पेट्रोल से कम होता है, जिससे गाड़ी का माइलेज और परफॉर्मेंस गिर जाएगा। इसे स्टोर करने के लिए खास टैंकों, सप्लाई चेन और फ्यूल पंपों की जरूरत होगी।
नए माॅडल
कार निर्माताओं को उतारने होंगे नए मॉडल
यह पेट्रोल से अलग तरह से काम करता है। इथेनॉल का फ्यूल सिस्टम के कुछ मटीरियल पर असर पड़ता है और इसके लिए इंजन कैलिब्रेशन, इंजेक्टर, फ्यूल पंप और लाइनों में बदलाव करने की जरूरत होती है। ऐसे में कार निर्माताओं को नए मॉडल बाजार में उतारने होंगे। मारुति सुजुकी ने हाल ही में फ्लेक्स फ्यूल से चलने वाला वैगनआर लॉन्च की है। इसके अलावा, टोयोटा, MG और हुंडई भी फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां बनाने पर काम कर रही हैं।