इंजन ऑयल को लेकर आप भी तो नहीं हैं इन 5 गलतफहमियों के शिकार
क्या है खबर?
इंजन ऑयल आपके वाहन के लाइफलाइन होता है। यह इंजन के अंदर मौजूद पुर्जों को चिकनाई देकर घिसावट कम करके तापमान को नियंत्रित रखने में मदद करता है। ऑयल को लेकर कई गलतफहमियां फैली हुई हैं, जिनकी वजह से कई बार लोग बेवजह खर्च कर बैठते हैं या इंजन को नुकसान पहुंचा देते हैं। अगर, आप भी इसी तरह की गलतियां करते हैं तो जान लें ऑयल से जुड़े 5 मिथक, जिन पर ध्यान नहीं देना नुकसानदायक हो सकता है।
ब्रांड
ब्रांड बदलने से क्या पड़ता है असर?
ब्रांड बदलने से गाड़ी हो जाती है खराब: अक्सर लोगों में इस बात का डर रहता है कि ऑयल का ब्रांड बदलने से इंजन को नुकसान हो सकता है, जबकि ऐसा नहीं है। अगर, ऑयल का ग्रेड आपकी गाड़ी के लिए सही है तो ब्रांड बदलने से कोई नुकसान नहीं होता। वारंटी खत्म होने का खतरा: कई लोग सोचते हैं कि उन्होंने डीलरशिप के अलावा कहीं और ऑयल बदलवाया तो वारंटी खत्म हो जाएगी, जबकि यह बात सही नहीं है।
गाढ़ा या पतला
ज्यादा गाढ़ा या पतला ऑयल फायदेमंद?
वाहना चालकों में यह भी गलतफहमी है कि गाढ़ा ऑयल इंजन को ज्यादा सुरक्षित रखता है या पतला ऑयल माइलेज बढ़ा देगा। हकीकत में ज्यादा गाढ़ा ऑयल इंजन को जरूरत से ज्यादा गर्म कर सकता है और ज्यादा पतला ऑयल इंजन के पुर्जों को ठीक से चिकनाई नहीं दे पाता। इसलिए, हमेशा वही ऑयल इस्तेमाल करें, जो आपकी गाड़ी के मैनुअल में कंपनी ने बताया है। यह इंजन के डिजाइन के हिसाब से चुना गया होता है।
मिश्रण
सिंथेटिक और साधारण ऑयल मिलाने से क्या खराब होगा इंजन?
सिंथेटिक और साधारण ऑयल नहीं करें मिक्स: कई मानते हैं कि सिंथेटिक और साधारण ऑयल मिलाने से इंजन खराब हो जाएगा, जो मिथक है। आवश्यकता पड़ने पर ऐसा कर सकते हैं। इससे इंजन को तुरंत कोई नुकसान नहीं होता। 5,000 किलोमीटर पर बदलना जरूरी: पुरानी गाड़ियों में 3 महीने या 5,000 किलोमीटर की यात्रा के बाद ऑयल बदलना जरूरी था। नई गाड़ियां और सिंथेटिक ऑयल काफी एडवांस हो चुके हैं। इस कारण 15,000 किलोमीटर तक बदलने की जरूरत नहीं पड़ती।