क्या पुरानी पेट्रोल-डीजल कार को इलेक्ट्रिक में बदलना है समझदारी? इन बातों पर करें विचार
क्या है खबर?
दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को बढ़ावा देने ठोस समाधान माना जा रहा है। इसी को देखते हुए सरकार ने EV 2.0 नीति में पेट्रोल-डीजल कारों को इलेक्ट्रिक पावरट्रेन से लैस करने के लिए प्रोत्साहन की सिफारिश की है। इससे पहले 2021 में 10 साल पुरानी डीजल कारों को इलेक्ट्रिक में बदलने पर चलाने की अनुमति दी थी। आइये जानते हैं पुरानी पेट्रोल-डीजल कार को इलेक्ट्रिक में बदलना सही या गलत है।
बदलाव
क्या करना पड़ता है बदलाव?
डीजल या पेट्रोल से चलने वाली गाड़ी को इलेक्ट्रिक कार में बदलना काफी आसान है। इसमें मौजूदा गियरबॉक्स के साथ एक इलेक्ट्रिक ड्राइवट्रेन जोड़ा जाता है। इस किट में ऐसे कंपोनेंट्स होते हैं, जिन्हें पेट्रोल या डीजल वाहनों को इलेक्ट्रिक वाहनों में बदलने के लिए डिजाइन किया है। इनमें एक इलेक्ट्रिक मोटर, कंट्रोलर, बैटरी पैक, चार्जिंग सिस्टम और अन्य आवश्यक उपकरण होते हैं। इस प्रक्रिया में, आंतरिक दहन इंजन और संबंधित पुर्जों को इलेक्ट्रिक ड्राइवट्रेन से बदल दिया जाता है।
लागत
कितनी आती है बदलाव कराने में लागत?
जानकारों के अनुसार, 1kWh लिथियम-आयन बैटरी की कीमत लगभग 14,000 रुपये होती है। अगर, आप लगभग 250 किलोमीटर की रेंज चाहते हैं तो 25-30kWh क्षमता के बैटरी पैक की आवश्यकता होती है। इस हिसाब से बैटरी की कीमत कम से कम 3.50 लाख रुपये होगी। इसके अलावा AC यूनिट, इलेक्ट्रिक मोटर और अन्य पार्ट्स पर लगभग 2.5 से 3 लाख रुपये का खर्चा अलग होता है। इस तरह इस बदलाव पर 5 लाख रुपये या उससे ज्यादा खर्च होंगे।
फायदा-नुकसान
इस विकल्प चुनने के फायदे या नुकसान?
दिल्ली में 15 साल पुरानी पेट्रोल और 10 साल पुरानी डीजल कारों को सड़कों पर नहीं चलाया जा सकता। ऐसे में उन्हें इलेक्ट्रिक में बदलना सही निर्णय हो सकता है। बिजली से चलाने की लागत भी कम होती है। इन गाड़ियों को इलेक्ट्रिक कार में बदलने की महंगी लागत को देखते हुए यह फैसला उचित नहीं लगता। एक पुरानी कार में 4-5 लाख रुपये खर्च करने के बजाय नई खरीदना सही होगा, जो कई सालों तक बिना मरम्मत के दौड़ेगी।