नेपाल में गोरखा सैनिकों ने भारत की 'अग्निपथ योजना' में शामिल करने की क्यों उठाई मांग?
क्या है खबर?
भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ के 16 अगस्त को होने वाले आगामी नेपाल दौरे से पहले नेपाल के पोखरा में पूर्व गोरखा सैनिकों और स्थानीय युवाओं ने एक बड़ा विरोध प्रदर्शन किया है। इंडियन एक्स-सर्विसमैन गोरखा ब्रिगेड नेपाल के नेतृत्व में हुए इस आंदोलन में मांग की गई है कि काठमांडू सरकार अपनी हठधर्मिता छोड़कर नेपाली युवाओं को भारत की 'अग्निपथ योजना' के तहत भारतीय सेना में भर्ती होने की तुरंत अनुमति दे। आइए इसका कारण जानते हैं।
विरोध
गोरखा सैनिकों का प्रदर्शन और मांग
पूर्व गोरखा सैनिकों, उनके परिवारों और समर्थकों ने 12 अगस्त को पोखरा स्टेडियम से लेकर कास्की जिले के जिला प्रशासन कार्यालय तक एक विशाल विरोध रैली का आयोजन किया। इसमें सैकड़ों की संख्या में लोग शामिल थे।
इसमें प्रदर्शनकारियों के हाथों में तख्तियां और बैनर थे, जिन पर 'अग्निपथ योजना के तहत नेपाली युवाओं को भारतीय सेना में भर्ती करो', 'गृह मंत्रालय का पत्र रद्द करो' और 'पूर्व सैनिकों की आवाज सुनो' जैसे स्लोगन लिखे थे।
ज्ञापन
प्रदर्शनकारियों ने सौंपा 2 सूत्रीय ज्ञापन
रैली के बाद प्रदर्शनकारियों ने नेपाल सरकार को एक 2 सूत्रीय ज्ञापन सौंपा।
इसमें भारतीय सेना में गोरखाओं की भर्ती तुरंत बहाल करने और अपने नाम में सैनिक शब्द का उपयोग करने वाले पूर्व सैनिक संगठनों का नवीनीकरण करने की मांग शामिल थी।
ब्रिगेड के अध्यक्ष कर्नल कृष्ण बहादुर खत्री ने चेतावनी दी कि सुगौली संधि के समय से चली आ रही 200 साल से अधिक पुरानी प्रथा अब अग्निपथ योजना के कारण खतरे में है।
तुलना
खाड़ी देशों में जाने से बेहतर है भारतीय सेना की नौकरी- खत्री
खत्री ने कहा, "भारतीय सेना में 'अग्निपथ योजना' के तहत मिलने वाली नौकरी खाड़ी देशों में जाकर 50 डिग्री सेल्सियस की झुलसाने वाली गर्मी में न्यूनतम मजदूरी पर काम करने से सैकड़ों गुना बेहतर है। 4 साल की सेवा के दौरान हमारे युवा विभिन्न सुविधाओं के साथ लगभग 45 से 50 लाख रुपये कमा लेते हैं।"
उन्होंने आगे कहा, "भारतीय सेना की भर्ती पर रोक लगाए जाने से सैकड़ों नेपाली युवाओं को रोजगार से वंचित होना पड़ रहा है।"
सवाल
नेपाली गोरखाओं को भारतीय सेना में कैसे मिलती है नौकरी?
नेपाली गोरखा मूल रूप से 1947 के त्रिपक्षीय समझौते के तहत भारतीय सेना में नौकरी करते हैं।
यह समझौता नवंबर 1947 में भारत, नेपाल और ब्रिटेन की सरकारों के बीच हुआ था।
इसके तहत ब्रिटिश काल की मूल गोरखा रेजिमेंट्स का बंटवारा किया गया था। इनमें 4 रेजिमेंट ब्रिटिश सेना में गई थी, जबकि शेष 6 रेजिमेंटें (1, 3, 4, 5, 8 और 9) भारतीय सेना का हिस्सा बनी थी।
बाद में भारत ने '11वीं गोरखा राइफल्स' का गठन किया।
जानकरी
भारतीय सेना में गोरखा सैनिकों के लिए समान नियम और सुविधाएं
इस समझौते के तहत भारतीय सेना में शामिल होने वाले नेपाली नागरिकों (गोरखाओं) को सेवा की शर्तों, वेतन, भत्तों, चिकित्सा सुविधाओं और सेवानिवृत्ति के बाद स्थायी पेंशन के मामले में भारतीय नागरिकों के बिल्कुल समान माना जाता है।
योजना
क्या है अग्निपथ योजना?
भारत सरकार ने 2022 में 'अग्निपथ योजना' की शुरुआत की थी। इसके तहत 4 वर्षों के लिए सैनिकों की भर्ती की जाती है।
4 साल की सेवा के बाद योग्यता और संगठनात्मक आवश्यकता के आधार पर 25 प्रतिशत 'अग्निवीरों' को सेना में स्थायी रूप से (अगले 15 वर्षों के लिए) रख लिया जाता है।
शेष 75 प्रतिशत सैनिकों को एकमुश्त 'सेवा निधि' पैकेज देकर कार्यमुक्त कर दिया जाता है। हालांकि, उन्हें नियमित सैनिकों की तरह आजीवन पेंशन नहीं मिलती है।
जानकारी
शहादत और दिव्यांगता पर मुआवजा
योजना के तहत ड्यूटी के दौरान किसी अग्निवीर की मौत होने पर उसके परिवार को 1 करोड़ रुपये की एकमुश्त राशि और शेष अवधि का पूरा वेतन मिलता है। दिव्यांगता की स्थिति में 44 लाख रुपये तक का मुआवजा भी दिया जाता है।
आपत्ति
नेपाल ने 'अग्निपथ योजना' पर क्यों जताई आपत्ति?
भारत के 'अग्निपथ योजना' शुरू करने के दौरान नेपाल सरकार ने भारतीय सेना में नेपाली युवाओं की भर्ती पर रोक लगा दी।
नेपाल सरकार ने तर्क दिया कि यह योजना भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच 1947 के त्रिपक्षीय समझौते के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।
इसी तरह भारतीय सेना में भर्ती के नियमों या शर्तों में किसी भी प्रकार का बदलाव करने से पहले भारत सरकार को नेपाल को विश्वास में लेना चाहिए था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
जानकारी
नेपाल 1.32 लाख है भारतीय सेना के पूर्व सैनिकों की संख्या
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, किसी समय 32,000-35,000 नेपाली सैनिक भारतीय सेना में सेवारत थे। इसी तरह नेपाल में भारतीय सेना के पूर्व सैनिकों की संख्या लगभग 1.32 लाख है। ऐसे में भारतीय सेना में उनका बड़ा योगदान रहा है।
प्रभाव
नेपाल सरकार की रोक का क्या हो रहा असर?
भारतीय सेना में नेपाली गारेखाओं की भर्ती जारी रहने के दौरान वे हर साल लगभग 1,000 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा घर भेजते थे, जो नेपाल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी।
भारत में नौकरी का अवसर छिनने के कारण नेपाल के हताश युवा अब भारी जोखिम उठाकर रूसी सेना में भाड़े के सैनिक के रूप में भर्ती हो रहे हैं।
अब तक 200 से अधिक नेपाली युवा यूक्रेन के खिलाफ व्लादिमीर पुतिन की सेना में शामिल हो चुके हैं।
रुख
मामले पर क्या है भारत का आधिकारिक रुख?
भारतीय रक्षा मंत्रालय ने मामले पर अपना रुख पहले ही स्पष्ट कर दिया है।
पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान (सेवानिवृत्त) ने स्पष्ट कहा था कि भारतीय सेना में भर्ती के लिए समान नियम लागू होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि भारतीय नागरिकों के लिए अग्निपथ योजना हो और नेपाल के नागरिकों के लिए पुरानी व्यवस्था रहे। यह नेपाल सरकार पर निर्भर है कि वह अपने युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखकर क्या फैसला लेती है।