अमेरिका में नारीवादी आंदोलन की अगुवा ग्लोरिया स्टाइनम का निधन, भारत से था खास जुड़ाव
क्या है खबर?
अमेरिका में महिला मुक्ति आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहीं सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार ग्लोरिया स्टाइनम का 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। इंस्टाग्राम पर उनके फाउंडेशन ने बताया कि बुधवार को न्यूयॉर्क शहर स्थित उनके घर में स्टाइनम का निधन हो गया। इस दौरान उनके प्रियजन मौजूद थे। फाउंडेशन ने पोस्ट किया कि ग्लोरिया ने लगभग 100 साल का जीवन सार्थक रूप से व्यतीत किया और अंत तक समानता के लिए काम करती रहीं।
निधन
स्टाइनम की दादी भी महिला संगठन की प्रमुख
स्टाइनम का जन्म मार्च 1934 को ओहायो में हुआ था। उनके पिता प्राचीन वस्तुओं का कारोबार करते थे, जबकि मां पत्रकार थीं।
स्टाइनम की दादी पॉलीन पर्लमटर स्टाइनम भी ओहायो वीमेन्स सफ़रेज एसोसिएशन की अध्यक्ष रही थीं। स्टाइनम की स्कूली शिक्षा देर से शुरू हुई।
वर्ष 1944 में माता-पिता का तलाक होने के बाद उन्होंने अपनी मानसिक बीमार मां को संभाला।
अपनी 9 साल बड़ी बहन की मदद से स्टाइनम ने वॉशिंगटन डीसी से हाईस्कूल और मैसाचुसेट्स से स्नातक किया।
दौरा
भारत से स्टाइनम का क्या है संबंध?
न्यूयॉर्क स्टेट म्यूजियम के मुताबिक, वर्ष 1956 में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद स्टाइनम को चेस्टर बाउल्स फ़ेलोशिप के जरिए भारत आने का मौका मिला।
स्टाइनम ने यहां लगभग 2 साल 1956 से 1958 तक रहकर अध्ययन और शोध किया। कई सामाजिक और गैर-हिंसक विरोध-प्रदर्शनों को देखा और शामिल हुईं।
जमीनी स्तर पर लोगों को संगठित करने के तरीकों को करीब से देखा। भारत में बिताए समय का उनके जीवन, करियर और राजनीतिक सोच पर गहरा असर पड़ा।
यात्रा
भारत से लौटने पर पत्रकारिता में बनाया करियर
भारत से लौटने के बाद स्टाइनम ने 1960 के दशक में न्यूयॉर्क में स्वतंत्र पत्रकारिता शुरू की। उस समय अमेरिकी मीडिया में महिला पत्रकारों को गंभीर राजनीतिक विषयों पर काम करने के कम अवसर थे।
उन्होंने 1963 में 'शो' मैगज़ीन के लिए प्लेबॉय क्लब में अंडरकवर जाकर 'मैं एक प्लेबॉय बनी हूं' लिखी, जिसमें महिलाओं की खराब कार्य स्थितियों का खुलासा किया। तभी उनको बड़ी पहचान मिली।
इसके बाद 1968 में न्यूयॉर्क मैगजीन की फाउंडिंग एडिटर बनीं।
आंदोलन
नारीवादी आंदोलन में प्रवेश
अमेरिका में 1960 के दशक में महिला अधिकारों को लेकर बड़ा आंदोलन चल रहा था।
स्टाइनम के लिए निर्णायक क्षण तब आया, जब 1969 में वह गर्भपात के अधिकार से जुड़ा आंदोलन कवर करने गईं। महिलाओं के अनुभव सुनकर वह महिला आंदोलन की सक्रिय नेता बन गईं।
इसके बाद 1971-1972 में पहली नारीवादी 'मिस-मैगजीन' की सह-स्थापना की, जो महिलाओं के लिए महिलाओं द्वारा चलाई गई।
उन्होंने राजनीति में महिला भागीदारी बढ़ाने के लिए 1971 में राष्ट्रीय महिला राजनीतिक कॉकस बनाया।
उपलब्धि
66 साल की उम्र में शादी और उपलब्धियां
स्टाइनम लंबे समय तक शादी से बचती रहीं, लेकिन वर्ष 2000 में 66 साल की उम्र में उन्होंने पर्यावरण-पशु अधिकार कार्यकर्ता डेविड बेल से शादी की।
बेल मशहूर अभिनेता क्रिश्चियन बेल के पिता थे। स्टाइनम और बेल के कोई संतान नहीं थी। डेविड की 2003 में ब्रेन कैंसर से मृत्यु हो गई।
स्टाइनम को 2013 में राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिका का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम' दिया।
उनको राष्ट्रीय महिला हॉल ऑफ फेम सम्मान भी मिला।