अमेरिका सेना आज से शुरू करेगी ईरानी बंदरगाहों की पूर्ण नाकाबंदी
क्या है खबर?
पाकिस्तान के इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई शांति वार्ता विफल होने के बाद अमेरिकी सेना ने सोमवार से ईरानी बंदरगाहों पर पूर्ण नाकाबंदी शुरू कर दी है। अमेरिकी केंद्रीय कमान (CENTCOM) ने घोषणा की कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा के अनुसार, सेना 13 अप्रैल को सुबह 10 बजे (पूर्वी समय) से ईरानी बंदरगाहों में प्रवेश करने और बाहर निकलने वाले सभी समुद्री यातायात की नाकाबंदी शुरू कर देंगी।
नाकाबंदी
सभी देशों के जहाजों पर लागू होगी नाकाबंदी
CENTCOM ने बताया कि यह नाकाबंदी ईरान के बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों में प्रवेश करने और वहां से निकलने वाले सभी देशों के जहाजों पर समान रूप से लागू होगी। इसमें अरब सागर और ओमान की खाड़ी पर स्थित सभी ईरानी बंदरगाह शामिल हैं, जहां निष्पक्ष रूप से नाकाबंदी लागू की जाएगी। सेना ने बताया कि वह गैर-ईरानी बंदरगाहों से आने-जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों के लिए नौवहन की स्वतंत्रता में बाधा नहीं डालेंगे।
सलाह
अमेरिकी सेना ने सलाह जारी की
अमेरिकी सेना ने कहा कि नाकाबंदी शुरू होने से पहले एक औपचारिक सूचना के माध्यम से वाणिज्यिक नाविकों को अतिरिक्त जानकारी प्रदान की जाएगी। CENTCOM ने सभी नाविकों को सलाह दी है कि वे नाविकों के लिए जारी सूचना प्रसारणों पर नजर रखें और ओमान की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास परिचालन करते समय ब्रिज-टू-ब्रिज चैनल 16 पर अमेरिकी नौसेना बलों से संपर्क करें।
बयान
ट्रंप बोले- मुझे परवाह नहीं
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्लोरिडा से लौटने के बाद मैरीलैंड के जॉइंट बेस एंड्रयूज में पत्रकारों से इस्लामाबाद वार्ता विफल होने पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि ईरान अब बातचीत में वापस आता है कि नहीं, मुझे परवाह नहीं है, अगर वे वापस नहीं आते हैं, तो भी मुझे कोई परेशानी नहीं है। उन्होंने कहा कि ईरान के साथ युद्धविराम (22 अप्रैल तक) अच्छे से कायम है और अमेरिकी सेना 13 अप्रैल से नाकाबंदी शुरू करेगी।
बयान
ईरानी विदेश मंत्री बोले- बस कुछ इंच दूर थे
ईरान के विदेश मंत्री सैय्यद अब्बास अराघची ने वार्ता विफल होने के बाद एक्स पर लिखा, '47 वर्षों में उच्चतम स्तर पर हुई गहन बातचीत में, ईरान ने युद्ध समाप्त करने के लिए अमेरिका के साथ सद्भावनापूर्वक संवाद किया। लेकिन जब हम 'इस्लामाबाद समझौते' से बस कुछ ही इंच दूर थे, तो हमें अत्यधिक मांगों, बदलते लक्ष्यों और रुकावटों का सामना करना पड़ा। कोई सबक नहीं सीखा गया। सद्भावना से सद्भावना उत्पन्न होती है। शत्रुता से शत्रुता उत्पन्न होती है।'