यीशु मसीह को लपेटे गए 'ट्यूरिन के कफन' का संबध भारत से, नई जांच में खुलासा
क्या है खबर?
काफी सालों से लोगों के लिए आकर्षण और विवाद का विषय रहे यीशु मसीह को लपेटे गए 'ट्यूरिन के कफन' को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है। न्यू साइंटिस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, हाल में हुए DNA विश्लेषण से पता चला है कि इस 4.4 मीटर लंबे और 1.1 मीटर चौड़े कफन का संबंध भारत से है। जांच के दौरान कफन में विभिन्न प्रकार की पशु, पौधे और मानव सामग्री की पहचान हुई है।
अंश
भारतीय वंश का हिस्सा
इटली के पडोवा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 1978 में कफन से एकत्रित सामग्री का विश्लेषण किया था। इस दौरान पाया गया कि कपड़े पर मौजूद मानव DNA का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा भारतीय वंश का है। अब अटकलें लग रही है कि कफन बुनने में इस्तेमाल किया गया धागा प्राचीन भारत के सिंधु घाटी क्षेत्र से आया होगा। गियानी बारकासिया ने 2015 में लिनेन कपड़े का अध्ययन करते हुए पहली बार प्रस्ताव रखा था कि इसका संबंध भारत से है।
अध्ययन
टीम ने क्या किया अध्ययन?
बारकासिया और उनकी टीम ने उसी सामग्री का एक समान विश्लेषण किया और फिर से पाया कि कफन में मध्यकालीन और आधुनिक DNA की विशाल विविधता संरक्षित है। टीम ने अध्ययन में लिखा, "हमारे निष्कर्ष संरक्षण स्थितियों और पर्यावरणीय अंतःक्रियाओं पर प्रकाश डालते हैं, जो पहचाने गए आनुवंशिक वेरिएंट में मूल्यवान दृष्टिकोण प्रदान करते हैं, जो कई जैविक स्रोतों से उत्पन्न हुए हैं।" इसमें घरेलू बिल्लियों, कुत्तों, खेत के जानवरों, हिरण, खरगोश समेत आनुवंशिक सामग्री के निशान पाए गए हैं।
अध्ययन
भारतीय वंश के जुड़ाव के क्या हो सकते हैं कारण?
संभावना जताई जा रही है कि रोमनों ने सिंधु घाटी क्षेत्र से लिनन या सूत आयात किया होगा, जिससे कफन में भारतीय DNA समाहित हो गया होगा। यह भी संभव है कि सदियों से भारतीय मूल के व्यक्तियों द्वारा कफन को छुआ गया हो, जिसके परिणामस्वरूप DNA का स्थानांतरण हुआ हो। टीम का कहना है कि कफन कई व्यक्तियों के संपर्क में आया है, जिससे मूल DNA की पहचान करने की संभावना चुनौतीपूर्ण हो गई है।
इतिहास
यीशु मसीह का कफन माना जाता है इसे
लिनेन का यह कपड़ा 500 सालों से इटली के ट्यूरिन में सेंट जॉन द बैपटिस्ट के कैथेड्रल में रखा है। ऐसा माना जाता है कि इसमें यीशु मसीह को 2000 साल पहले उनके क्रूस पर चढ़ाए जाने के बाद लपेटा गया था। यह दुनिया की सबसे प्रसिद्ध और विवादास्पद ईसाई कलाकृतियों में एक है। इसका पहला दस्तावेजी प्रमाण 1354 में फ्रांस में मिलता है। यह लाखों आगंतुकों को आकर्षित करता है और इसकी प्रामाणिकता पर बहस को जन्म देता है।