कौन हैं पाजनिवेल, जिन्हें पारंपरिक मार्शल आर्ट में योगदान के लिए मिलेगा 'पद्मश्री'?
क्या है खबर?
पुडुचेरी के पूरननकुप्पम से आने वाले के. पाजनिवेल ने 5,000 साल पुरानी पारंपरिक युद्धकला (मार्शल आर्ट) 'सिलंबम' को दुनियाभर में पहचान दिलाई है। 53 वर्षीय पाजनिवेल ने बचपन में ही इस हथियार आधारित कला को सीखना शुरू किया और पूरी जिंदगी इसके प्रचार-प्रसार में लगा दी। उन्होंने कई प्रतियोगिताओं में जीत हासिल की और सिलंबम को आधुनिक प्रतिस्पर्धी खेल के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। इसी योगदान के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू उन्हें 'पद्मश्री' सम्मान से नवाजेंगी।
बचपन
13 साल की उम्र में अपने पिता को खोया
साधारण परिवार में जन्मे पाजनिवेल ने 13 साल की उम्र में अपने पिता को खो दिया था। परिवार की आर्थिक हालत कठिन थी और उनकी मां ने 4 बच्चों की परवरिश की। उनका परिवार फूस की छत वाले घर में रहता था। स्थानीय कार्यक्रमों के दौरान वह तमिलनाडु की प्राचीन युद्धकला सिलंबम से जुड़े। इसके बाद वह पूरी तरह इसी कला में रम गए। उनके अनुसार, गुरु उन्हें एक बार सिखाते थे, फिर वे घंटों धूप में अभ्यास करते थे।
कामकाज
7वीं कक्षा में छोड़ दिया था स्कूल
पाजनिवेल ने 7वीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़ा और बस साफ करने का काम शुरू किया। उस समय एक बस साफ करने के सिर्फ 3 रुपये मिलते थे, जबकि परिवार चलाने के लिए रोज 10 रुपये की जरूरत पड़ती थी। हालात इतने मुश्किल थे कि खाने के बारे में सोचना भी कठिन था। धीरे-धीरे वह बस चालक बन गए, लेकिन सिलंबम के प्रति उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ। जब भी मौका मिलता, वह लगातार इसका अभ्यास करते थे।
लगन
नौकरी छोड़कर सिलंबम को दिया पूरा जीवन
एक समय ऐसा आया जब पाजनिवेल ने बस चालक की नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह सिलंबम को ही अपना जीवन बना लिया। वह ज्यादातर छात्रों को मुफ्त में प्रशिक्षण देते हैं, क्योंकि उनके लिए यह सिर्फ कला नहीं, बल्कि जुनून है। वह देशभर में मंच प्रस्तुतियां देकर अपनी जीविका चलाते हैं। उन्होंने दुबई और पेरिस जैसे शहरों में भी उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन कर सिलंबम को नई पहचान दिलाई है।
पहचान
कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हासिल की जीत
पाजनिवेल ने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में जीत हासिल कर अपनी अलग पहचान बनाई है। साल 2002 में तिरुचिरापल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय स्तर की सिलंबम प्रतियोगिता में उन्होंने 56-60 किलोग्राम वर्ग में पहला स्थान हासिल किया था। इसके बाद 2004 में नागरकोइल में हुई राष्ट्रीय स्तर की सिलंबम प्रतियोगिता में 55-60 किलोग्राम वर्ग में भी पहला पुरस्कार जीता। इन लगातार सफलताओं ने पाजनिवेल को सिलंबम की दुनिया में बड़ा नाम बना दिया और उनकी कला को नई पहचान दिलाई।
सिलंबम
सिलंबम को मिली है अंतरराष्ट्रीय पहचान
पाजनिवेल ने 2022 में पुडुचेरी में अपनी जमीन पर 'मामल्लन सिलंबम एंड फोक आर्ट डेवलपमेंट क्लब' की स्थापना की। यहां वह अब तक 5,000 से ज्यादा छात्रों को प्रशिक्षण दे चुके हैं, जिनमें अधिकतर कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से आते हैं। वह स्कूली बच्चों के लिए मुफ्त कैंप भी चलाते हैं। यूरोप और ब्राजील समेत कई देशों के उनके शिष्यों ने विभिन्न प्रतियोगिताओं में जीत हासिल कर सिलंबम को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है।
सम्मान
25 मई को दिए जाएंगे 'पद्मश्री' सम्मान
राष्ट्रपति मुर्मू आगामी 25 मई को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित करेंगी। इस दौरान कुल 131 लोगों को पुरस्कार दिए जाएंगे। इनमें 113 'पद्मश्री', 5 'पद्म विभूषण' और 13 'पद्म भूषण' शामिल हैं।भारत सरकार #PeoplesPadma पहल के तहत ये सम्मान देश के उन असली नायकों तक पहुंच रही है, जिन्होंने बिना किसी पहचान या चमक-दमक के समाज के लिए बड़ा काम किया है।