राष्ट्रमंडल खेल 2026: बचपन में काटना पड़ा था हाथ, जानिए स्वर्ण विजेता दिलीप गावित की कहानी
क्या है खबर?
ग्लासगो में खेले जा रहे राष्ट्रमंडल खेल 2026 में दिलीप गावित ने अपनी मेहनत और हौसले से इतिहास रच दिया। उन्होंने पुरुषों की T-47 100 मीटर दौड़ में 10.71 सेकंड का समय निकालकर स्वर्ण पदक जीता, जबकि उनके साथी मोहम्मद बेसिल ने रजत पदक अपने नाम किया। यह भारत का तीसरा स्वर्ण पदक रहा। दिलीप की यह जीत सिर्फ पदक नहीं, बल्कि उस संघर्ष की कहानी है जब 5 साल की उम्र में उन्हें अपना एक हाथ गंवाना पड़ा था।
कहानी
इस कारण काटना पड़ा था दिलीप का हाथ
महाराष्ट्र के नाशिक के पास स्थित छोटे से गांव तोरण डोंगरी में जन्मे दिलीप ने 5 साल की उम्र में एक हादसे में अपना दायां हाथ गंवाया था।
पेड़ से गिरने के बाद लगी चोट का समय पर इलाज नहीं हो सका और संक्रमण बढ़कर गैंगरीन में बदल गया, जिसके बाद उनका हाथ काटना पड़ा।
किसानों के लिए जीवन आसान नहीं रहा है। तेज धूप और पानी की कमी जैसी चुनौतियों के बीच दिलीप ने मुश्किल हालातों में बचपन बिताया।
बयान
जीत के बाद दिलीप ने क्या कहा?
दिलीप ने कहा, "जब बारिश नहीं होती और अपनी जमीन पर खेती नहीं हो पाती थी तब मेरा परिवार मजदूरी करता था, लेकिन मैं वह भी नहीं कर सकता था। मुझे बेकार समझा जाता था।"
इसके बावजूद दिलीप गांव की रोजमर्रा जिंदगी से जुड़े रहे। खेतों में काम करने से उनका शरीर मजबूत हुआ और मुश्किल बचपन में दौड़ना ही उन्हें सुकून देता था।
वह कच्ची सड़कों पर दौड़ने लगे, जहां उनकी रफ्तार ने कोच वैजनाथ काले का ध्यान खींचा।
जीत
दिलीप ने धैर्य और मेहनत से दर्ज की जीत
दिलीप के धैर्य और मेहनत की यही नींव ग्लासगो की ठंडी और बारिश भरी शाम में उनके लिए बेहद अहम साबित हुई।
400 मीटर स्पेशलिस्ट दिलीप ने 2022 एशियन पैरा गेम्स में स्वर्ण जीता था और पेरिस 2024 पैरालंपिक के फाइनल तक पहुंचे थे।
ग्लासगो खेलों में T-47 400 मीटर स्पर्धा नहीं होने के कारण उन्हें 100 मीटर दौड़ में उतरना पड़ा।
ये बदलाव आसान नहीं था, ऊपर से लगातार बारिश ने चुनौती और बढ़ा दी।
खेल
एथलेटिक्स में क्या होता है T-47 वर्ग?
T-47 में वो खिलाड़ी आते हैं जिनके, एक हाथ में कंधे, कोहनी या कलाई पर कुछ हद तक कार्यक्षमता का नुकसान हो।
उनके कलाई या कोहनी के नीचे का हिस्सा विकलांगता से प्रभावित होता है।
T-47 में विकलांगता अपेक्षाकृत कम गंभीर होती है, इसलिए ये खिलाड़ी अन्य पैरा खिलाड़ियों की तुलना में सबसे तेज दौड़ते हैं।
इस वर्ग में खिलाड़ी खड़े होकर दौड़ते हैं। कोई व्हीलचेयर या प्रॉस्थेसिस (कृत्रिम अंग) इस्तेमाल नहीं होता।