स्विफ्ट टेलीस्कोप पृथ्वी पर गिरने से बचाना क्यों है नासा के लिए जरूरी? जानिए इसकी खासियत
क्या है खबर?
अंतरिक्ष एजेंसी नासा अपने पुराने हो चुके स्विफ्ट स्पेस टेलीस्कोप को धरती पर गिरने से पहले बचाने की तैयारी कर रही है। इसके लिए एजेंसी ने कैटालिस्ट स्पेस टेक्नोलॉजीज के साथ मिलकर एक खास रोबोटिक मिशन तैयार किया है। इस मिशन के तहत एक स्पेसक्राफ्ट स्विफ्ट टेलीस्कोप को पकड़कर उसे ऊंची कक्षा में पहुंचाएगा। अगर यह मिशन सफल रहा, तो यह अपनी तरह का पहला अमेरिकी मिशन होगा और अंतरिक्ष इतिहास में नया रिकॉर्ड बनेगा।
वजह
धरती पर गिरने से पहले बचाना क्यों जरूरी है?
स्विफ्ट टेलीस्कोप साल 2004 में लॉन्च किया गया था और अब लगातार अपनी ऊंचाई खो रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, सूर्य की बढ़ी हुई गतिविधि के कारण पृथ्वी का ऊपरी वायुमंडल फैल गया है, जिससे टेलीस्कोप पर ज्यादा खिंचाव पड़ रहा है। अगर इसकी ऊंचाई 300 किलोमीटर से नीचे पहुंच गई, तो इसे सुरक्षित पकड़ना लगभग असंभव हो जाएगा। इसलिए नासा समय रहते इसे बचाने की कोशिश में जुटा है।
अहमियत
स्विफ्ट नासा के लिए इतना अहम क्यों है?
स्विफ्ट टेलीस्कोप आज भी अंतरिक्ष में होने वाले गामा-रे विस्फोट, सुपरनोवा, ब्लैक होल और न्यूट्रॉन स्टार जैसी घटनाओं का तेजी से पता लगाने का काम करता है। इसे नासा का "फर्स्ट रिस्पॉन्डर" भी कहा जाता है, क्योंकि यह अचानक होने वाली खगोलीय घटनाओं की तुरंत जानकारी देता है। नासा का कहना है कि नया टेलीस्कोप बनाना बहुत महंगा होगा, इसलिए मौजूदा स्विफ्ट को बचाना ज्यादा बेहतर और किफायती विकल्प है।
योजना
टेलीस्कोप को बचाने के लिए क्या है योजना?
नासा ने इस मिशन के लिए कैटालिस्ट स्पेस टेक्नोलॉजीज को 3 करोड़ डॉलर (लगभग 30 करोड़ रुपये) का कॉन्ट्रैक्ट दिया है। इसके तहत लिंक नाम का रोबोटिक स्पेसक्राफ्ट 3 रोबोटिक भुजाओं की मदद से स्विफ्ट को पकड़कर उसकी कक्षा 360 किलोमीटर से बढ़ाकर 600 किलोमीटर तक ले जाएगा। इसके बाद टेलीस्कोप फिर से वैज्ञानिक अध्ययन शुरू कर सकेगा। यह मिशन भविष्य में हबल जैसे दूसरे पुराने टेलीस्कोप की मरम्मत और उनकी उम्र बढ़ाने का रास्ता भी खोल सकता है।
अन्य
भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों के लिए होगा बड़ा कदम
नासा का मानना है कि अगर यह मिशन सफल रहता है, तो भविष्य में पुराने सैटेलाइट और स्पेस टेलीस्कोप को फेंकने की बजाय उनकी मरम्मत, ईंधन भरने और सुरक्षित कक्षा में पहुंचाने का नया तरीका विकसित होगा। इससे अंतरिक्ष मिशनों की लागत कम होगी और उपकरणों की उम्र बढ़ाई जा सकेगी। यही तकनीक आगे चलकर बड़े अंतरिक्ष ढांचे और दूसरे वैज्ञानिक मिशनों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।