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चांद पर बेस बनाने के लिए नासा को ISRO की जरूरत क्यों? जानें क्या है वजह
इससे दोनों देशों की अंतरिक्ष साझेदारी को नई दिशा और मजबूती मिलने की उम्मीद है (प्रतीकात्मक तस्वीर)

चांद पर बेस बनाने के लिए नासा को ISRO की जरूरत क्यों? जानें क्या है वजह

Aug 12, 2026
01:46 pm

क्या है खबर?

अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) को अपने मून बेस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है। यह निमंत्रण 5 और 6 अगस्त को बेंगलुरु में हुई भारत-अमेरिका सिविल स्पेस जॉइंट वर्किंग ग्रुप की नौवीं बैठक में दिया गया। बातचीत में चंद्रमा की खोज, मानव अंतरिक्ष उड़ान, वैज्ञानिक शोध और आर्टेमिस समझौते के तहत सहयोग पर चर्चा हुई। इससे दोनों देशों की अंतरिक्ष साझेदारी को नई दिशा और मजबूती मिलने की उम्मीद है।

उद्देश्य

ISRO से क्या चाहती है नासा?

नासा चाहती है कि ISRO चंद्रमा पर लंबे समय तक इंसानी गतिविधियों की योजना में अपनी विशेषज्ञता और तकनीकी अनुभव साझा करे।

भारत चंद्रयान मिशनों से चांद पर पहुंचने, सुरक्षित उतरने और वैज्ञानिक उपकरण चलाने का अनुभव हासिल कर चुका है। नासा के मून बेस कार्यक्रम में दक्षिणी ध्रुव पर लैंडर, रोवर और वैज्ञानिक उपकरण विकसित करने पर जोर है।

दोनों देश वैज्ञानिक जानकारी साझा करने और मानव अंतरिक्ष उड़ान तकनीक पर भी मिलकर काम कर सकते हैं।

फायदा

ISRO को मिल सकता है बड़ा फायदा

इस साझेदारी से ISRO को चंद्रमा से जुड़े वैज्ञानिक सहयोग और तकनीक का फायदा मिल सकता है।

चंद्रयान-3 की सफल सॉफ्ट लैंडिंग ने भारत की चंद्र लैंडिंग क्षमता साबित की है। गगनयान के जरिए मानव अंतरिक्ष उड़ान की तैयारी भी चल रही है। नासा के साथ काम करने से भारतीय वैज्ञानिकों को मानव मिशन, चंद्र विज्ञान, रोबोटिक्स और अंतरिक्ष संचालन का अनुभव मिलेगा।

इससे भारत भविष्य के चंद्र मिशनों में अपनी भूमिका और तकनीकी क्षमता मजबूत कर सकता है।

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दक्षिणी ध्रुव

चांद का दक्षिणी ध्रुव क्यों है खास?

चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव इस योजना का अहम हिस्सा है।

वहां कुछ गड्ढों में लंबे समय से सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती, इसलिए पानी की बर्फ मौजूद होने की संभावना है। दूसरी ओर, आसपास के ऊंचे इलाकों में लंबे समय तक सूर्य की रोशनी मिल सकी है।

भविष्य में बर्फ से पानी, ऑक्सीजन और ईंधन तैयार करने की संभावना इस क्षेत्र को स्थायी बेस के लिए अहम बनाती है। इसलिए चंद्रमा की खोज अब सिर्फ लैंडिंग तक सीमित नहीं है।

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चीन

चीन के लिए क्या है इसका मतलब?

भारत का नासा के साथ जुड़ना चीन के लिए भी रणनीतिक संकेत माना जा सकता है।

चीन चांग-A7 के जरिए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव का अध्ययन कर रहा और उसका लक्ष्य 2030 तक मानव को चांद पर भेजना है। चीन रूस के साथ इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन पर भी काम कर रहा है।

ऐसे समय में भारत का आर्टेमिस नेटवर्क से जुड़ना अमेरिकी नेतृत्व वाले चंद्र सहयोग को मजबूत करेगा और भविष्य की चंद्र गतिविधियों में भारत की अहमियत बढ़ाएगा।

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