वैज्ञानिक बना रहे हैं त्वचा से दिमाग जैसा ऊतक, क्या है इसके पीछे उद्देश्य?
क्या है खबर?
अमेरिका समेत कई वैज्ञानिक अब इंसानी त्वचा के छोटे नमूने से लैब में दिमाग जैसा ऊतक तैयार कर रहे हैं। इसके लिए वयस्क कोशिकाओं को खास प्रक्रिया से दोबारा ऐसी अवस्था में लाया जाता है, जहां वे अलग-अलग तरह की कोशिकाओं में बदल सकती हैं। आगे इन्हीं कोशिकाओं से तीन आयामी ब्रेन ऑर्गेनॉइड तैयार किए जाते हैं। ये असली इंसानी दिमाग नहीं होते, लेकिन इनमें न्यूरॉन्स और उनकी गतिविधियों जैसी कुछ अहम विशेषताएं दिखाई दे सकती हैं।
निर्माण
कैसे हो रहा इसका निर्माण?
इस निर्माण की शुरुआत त्वचा जैसी वयस्क कोशिकाओं को इंड्यूस्ड प्लुरिपोटेंट स्टेम सेल यानी iPSC में बदलने से होती है।
वैज्ञानिक इनके अंदर मौजूद जैविक निर्देशों को बदलकर उन्हें ज्यादा लचीली अवस्था में पहुंचाते हैं। इसके बाद खास रासायनिक संकेत और नियंत्रित परिस्थितियां देकर कोशिकाओं को न्यूरॉन्स समेत अलग-अलग दिमागी कोशिकाओं में विकसित किया जाता है।
धीरे-धीरे ये कोशिकाएं आपस में जुड़कर छोटे तीन आयामी तंत्रिका ऊतक का रूप लेने लगती हैं।
नेटवर्क
न्यूरॉन्स मिलकर बनाने लगते हैं नेटवर्क
ब्रेन ऑर्गेनॉइड तैयार होने के बाद वैज्ञानिक उन्हें नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में बढ़ाते हैं।
इनमें बनने वाले न्यूरॉन्स आपस में नेटवर्क बना सकते हैं और इलेक्ट्रिकल तथा रासायनिक संकेतों के जरिए बातचीत कर सकते हैं। रिसर्चर इलेक्ट्रोड और दूसरे उपकरणों से इस गतिविधि को रिकॉर्ड कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर कोशिकाओं को संकेत भी दे सकते हैं।
हालांकि इन ऑर्गेनॉइड में पूरे इंसानी दिमाग जैसा ढांचा, रक्त प्रवाह और जटिलता नहीं होती है।
उद्देश्य
क्या है इसके पीछे उद्देश्य?
इन ऑर्गेनॉइड बनाने का मुख्य उद्देश्य इंसानी दिमाग के विकास और बीमारियों को बेहतर समझना है।
वैज्ञानिक इनका इस्तेमाल न्यूरोलॉजिकल बीमारियों की प्रक्रिया देखने और संभावित दवाओं का शुरुआती परीक्षण करने में कर सकते हैं। जानवरों पर असर दिखाने वाली हर दवा इंसानों में भी काम करे, यह जरूरी नहीं होता।
इसलिए इंसानी कोशिकाओं से बने मॉडल शोधकर्ताओं को एक अतिरिक्त रास्ता देते हैं और कुछ मामलों में जानवरों पर निर्भरता घटाने में मदद कर सकते हैं।
भविष्य
आगे बायोलॉजिकल कंप्यूटिंग की भी संभावना
यह तकनीक आगे चलकर मेडिकल रिसर्च के साथ बायोलॉजिकल कंप्यूटिंग में भी इस्तेमाल हो सकती है।
कुछ शोधों में जीवित न्यूरॉन्स को इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम से जोड़कर उनकी प्रतिक्रिया और सीखने जैसी गतिविधियों का अध्ययन किया गया है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ये छोटे दिमाग सोचते या चेतना रखते हैं।
वैज्ञानिक अभी भी इस सवाल पर शोध कर रहे हैं। जैसे-जैसे ऑर्गेनॉइड ज्यादा जटिल होंगे, उनकी सुरक्षा, सहमति और नैतिकता से जुड़े सवाल भी बढ़ेंगे।