नासा ने परमाणु रॉकेट का किया परीक्षण, अंतरिक्ष मिशनों में कैसे मिलेगा फायदा?
क्या है खबर?
अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने फुल-स्केल रिएक्टर डेवलपमेंट यूनिट के कोल्ड-फ्लो टेस्ट को पूरा कर लिया है। यह टेस्ट इसी महीने सफलतापूर्वक किए गए, जो 1960 के दशक के बाद इस तरह का पहला बड़ा प्रयोग है। इस तकनीक का मकसद न्यूक्लियर रॉकेट को केमिकल इंजन से ज्यादा तेज, ताकतवर और प्रभावी बनाना है। नासा का कहना है कि इससे भविष्य के डीप-स्पेस मिशन आसान, सुरक्षित और समय की बचत वाले हो सकेंगे।
परीक्षण
मार्शल सेंटर में ऐसे हुआ रिएक्टर का परीक्षण
नासा के मुताबिक, अलबामा स्थित मार्शल स्पेस फ्लाइट सेंटर में 44×72 इंच के रिएक्टर मॉडल पर 100 से ज्यादा कोल्ड-फ्लो टेस्ट किए गए। यह नॉन-न्यूक्लियर मॉडल BWX टेक्नोलॉजीज ने तैयार किया था। इन परीक्षणों में हाइड्रोजन के फ्लो, दबाव और कंट्रोल सिस्टम को बहुत ही विस्तार से जांचा गया। इंजीनियरों ने पाया कि रिएक्टर बिना किसी खतरनाक कंपन, लीकेज या तकनीकी दिक्कत के स्थिर रूप से पूरे समय काम करता रहा।
फायदा
अंतरिक्ष मिशनों को कैसे मिलेगा फायदा?
न्यूक्लियर थर्मल रॉकेट तकनीक से अंतरिक्ष यात्राएं ज्यादा तेज और भरोसेमंद हो सकेंगी, जिससे अंतरिक्ष यात्रियों को रेडिएशन के खतरे में बहुत कम समय बिताना पड़ेगा। नासा के अधिकारियों के अनुसार, यह नई तकनीक स्पेसक्राफ्ट को ज्यादा वजन, ज्यादा ईंधन और जरूरी उपकरण ले जाने में मदद करेगी। तेज रफ्तार और बेहतर क्षमता के कारण चंद्रमा और मंगल जैसे दूर के मिशन ज्यादा सुरक्षित, किफायती और असरदार बन सकते हैं।
असर
आर्टेमिस और मून-टू-मार्स मिशन पर असर
नासा प्रशासक के अनुसार, यह तकनीक आर्टेमिस प्रोग्राम और मून-टू-मार्स मिशन के लिए बेहद अहम साबित होगी। नासा और अमेरिकी ऊर्जा विभाग मिलकर इस तकनीक पर आगे भी गहन रिसर्च और परीक्षण कर रहे हैं। आने वाले समय में स्पेस में इसका डेमोंस्ट्रेशन किया जा सकता है। नासा का मानना है कि न्यूक्लियर प्रोपल्शन भविष्य की अंतरिक्ष खोजों को नई दिशा देगा और इंसानों को गहरे अंतरिक्ष तक पहुंचने में मदद करेगा।