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मेटा ने 24×7 सौर ऊर्जा के लिए की साझेदारी, AI डाटा सेंटर्स के लिए जरूरत
मेटा ने 24×7 सौर ऊर्जा के लिए की साझेदारी

मेटा ने 24×7 सौर ऊर्जा के लिए की साझेदारी, AI डाटा सेंटर्स के लिए जरूरत

Apr 27, 2026
07:31 pm

क्या है खबर?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक के तेजी से बढ़ते उपयोग के कारण मेटा को अधिक बिजली की जरूरत पड़ रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए कंपनी ने ओवरव्यू एनर्जी नाम के स्टार्टअप के साथ एक अहम समझौता किया है। इस योजना के तहत सैटेलाइट के जरिए रात में भी सोलर पावर जमीन पर भेजी जाएगी। यह कदम डाटा सेंटर्स के लिए लगातार और भरोसेमंद बिजली उपलब्ध कराने की दिशा में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

काम

कैसे काम करेगी स्पेस सोलर टेक्नोलॉजी?

ओवरव्यू एनर्जी अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट्स के जरिए सूरज की ऊर्जा इकट्ठा करेगा। इसके बाद इस ऊर्जा को इंफ्रारेड लाइट में बदलकर पृथ्वी पर मौजूद सोलर फार्म्स तक भेजा जाएगा। ये फार्म इस लाइट को बिजली में बदल देंगे। इस तकनीक की खास बात यह है कि इससे दिन-रात और मौसम की समस्या दूर हो जाती है। इससे लगातार बिजली मिल सकती है, जो डेटा सेंटर्स के लिए बहुत जरूरी होती है।

डेमो

डेमो और भविष्य की टाइमलाइन

कंपनी ने इस तकनीक का शुरुआती परीक्षण कर लिया है और अब 2028 में पहला सैटेलाइट लॉन्च करने की तैयारी है। इसके बाद 2030 तक करीब 1000 सैटेलाइट्स भेजने का लक्ष्य रखा गया है। हर सैटेलाइट लंबे समय तक बिजली देने में सक्षम होगा। मेटा ने इस प्रोजेक्ट के तहत 1 गीगावाट तक बिजली लेने का समझौता किया है, जिससे उसकी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी।

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AI की बढ़ती मांग और ऊर्जा संकट

AI की बढ़ती मांग और ऊर्जा संकट

AI तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल से कंपनियों की बिजली की खपत तेजी से बढ़ रही है। मेटा के डाटा सेंटर्स पहले ही बहुत अधिक बिजली इस्तेमाल कर रहे हैं। पारंपरिक सोलर पावर रात में काम नहीं करती, जबकि बैटरी स्टोरेज महंगा और सीमित होता है। ऐसे में स्पेस-बेस्ड सोलर पावर एक नया और लगातार चलने वाला विकल्प बनकर सामने आ रहा है, जो भविष्य में बड़ी भूमिका निभा सकता है।

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संभावनाएं

चुनौतियां और भविष्य की संभावनाएं

यह तकनीक काफी नई है और इसमें कई चुनौतियां भी हैं। हजारों सैटेलाइट लॉन्च करना महंगा और जटिल काम है। साथ ही, इसे बड़े स्तर पर सफल साबित करना भी जरूरी होगा। फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह प्रोजेक्ट सफल होता है, तो यह ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकता है। इससे साफ ऊर्जा को बढ़ावा मिलेगा और फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता भी कम हो सकती है।

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