हजारों किलोमीटर दूर तक कैसे पहुंचेगी अग्नि-6? जानिए इसके पीछे की तकनीक
क्या है खबर?
भारत की अग्नि मिसाइल श्रृंखला में अग्नि-6 को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है। इसे भविष्य में विकसित की जाने वाली अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल के रूप में बताया जाता है। कुछ रिपोर्टों में इसकी संभावित रेंज 8,000 से 12,000 किलोमीटर तक बताई गई है। हालांकि, इसकी अंतिम क्षमता और तैनाती को लेकर भारत सरकार या DRDO ने विस्तृत आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। इसलिए इससे जुड़े कई दावे अभी अनुमान पर आधारित हैं।
इंजन
रॉकेट इंजन और स्टेजिंग से मिलेगी लंबी दूरी
इतनी लंबी दूरी तय करने के लिए मिसाइल में रॉकेट प्रोपल्शन और मल्टी-स्टेज तकनीक महत्वपूर्ण होती है।
रॉकेट के अलग-अलग चरणों में ईंधन और इंजन होते हैं। ईंधन खत्म होने के बाद खाली हिस्सा अलग हो जाता है, जिससे बाकी वाहन हल्का हो जाता है। कम वजन के कारण आगे की उड़ान के लिए अधिक गति हासिल करना आसान होता है।
अग्नि परिवार में ठोस ईंधन, मार्गदर्शन, नियंत्रण और एयरोडायनामिक्स जैसी तकनीकों पर लंबे समय से काम हुआ है।
रास्ता
बैलिस्टिक ट्रैजेक्टरी तय करती है उड़ान का रास्ता
मिसाइल के ऊपर जाने के बाद उसकी उड़ान का बड़ा हिस्सा बैलिस्टिक ट्रैजेक्टरी यानी तय घुमावदार उड़ान पथ पर होता है।
इस दौरान गुरुत्वाकर्षण और शुरुआती गति उसकी आगे की यात्रा को प्रभावित करते हैं। मिसाइल की पहुंच केवल इंजन की ताकत से तय नहीं होती, बल्कि लॉन्च स्थान, उड़ान पथ और ले जाए जाने वाले वजन जैसे कारक महत्वपूर्ण होते हैं।
इसलिए किसी मिसाइल के लिए धरती पर कहीं भी पहुंचने का दावा तकनीकी रूप से सही नहीं है।
री-एंट्री
री-एंट्री के दौरान बनती है सबसे ज्यादा गर्मी
लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल के लिए धरती के वातावरण में दोबारा प्रवेश करना बेहद कठिन चरण होता है।
बहुत तेज गति से वापस आते समय सामने की हवा तेजी से दबती और गर्म होती है, जिससे अत्यधिक तापमान पैदा होता है। इसे संभालने के लिए विशेष गर्मीरोधी सामग्री और मजबूत संरचना की जरूरत होती है।
अग्नि-6 की वास्तविक क्षमता, रेंज और तकनीकी विशेषताओं की तस्वीर आधिकारिक परीक्षणों और सरकार की सार्वजनिक जानकारी के बाद ही पूरी तरह साफ होगी।