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AI टूल्स कैसे रिन्यूएबल एनर्जी मैनेजमेंट को बना रहे हैं बेहतर?
AI टूल्स रिन्यूएबल एनर्जी मैनेजमेंट को बेहतर बना रहे हैं

AI टूल्स कैसे रिन्यूएबल एनर्जी मैनेजमेंट को बना रहे हैं बेहतर?

Apr 16, 2026
11:29 pm

क्या है खबर?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) रिन्यूएबल एनर्जी मैनेजमेंट में बड़ा बदलाव ला रहा है। इसकी मदद से ऊर्जा की मांग और सप्लाई का सही अनुमान लगाना आसान हो गया है। इससे सोलर और विंड जैसी ऊर्जा को सिस्टम में जोड़ना बेहतर तरीके से हो रहा है। AI के उपयोग से ग्रिड मैनेजमेंट मजबूत हुआ है और ऊर्जा का संतुलन बनाए रखना आसान हुआ है, जिससे फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता धीरे धीरे कम हो रही है।

#1

ऊर्जा की भविष्यवाणी में प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स

AI टूल्स बड़े डाटा का विश्लेषण करके ऊर्जा की मांग का सटीक अनुमान लगाते हैं। यूनाइटेड किंगडम (UK) का नेशनल ग्रिड कॉर्प ESO इस तकनीक का उपयोग करता है, जिससे कई बार 100 प्रतिशत जीरो कार्बन बिजली संभव हो पाती है। EDF एनर्जी भी AI मॉडल का इस्तेमाल कर ऊर्जा उत्पादन का अनुमान लगाती है, जिससे ग्रिड संतुलन बेहतर होता है और गैस आधारित बिजली पर निर्भरता कम होती है।

#2

कार्यक्षमता के लिए रियल-टाइम एडजस्टमेंट

AI की मदद से रियल टाइम में सिस्टम को एडजस्ट करना संभव हुआ है। गूगल डीपमाइंड इसका अच्छा उदाहरण है, जो डाटा सेंटर की ऊर्जा खपत को बेहतर बनाता है। यह तकनीक मांग और उपलब्ध ऊर्जा को मिलाकर काम करती है, जिससे कूलिंग में 40 प्रतिशत तक ऊर्जा की बचत होती है। इससे न सिर्फ लागत घटती है, बल्कि प्रदूषण भी कम होता है और रिन्यूएबल ऊर्जा का उपयोग बढ़ता है।

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#3

जेनरेटिव AI से इमारतों में सुधार

AI का उपयोग इमारतों की कार्यक्षमता बढ़ाने में भी तेजी से हो रहा है। ब्रेन बॉक्स AI को HVAC सिस्टम में जोड़कर ऊर्जा की बचत करता है और संचालन को बेहतर बनाता है। अमेजन बेडरॉक की मदद से यह सिस्टम ऊर्जा लागत को 25 प्रतिशत और उत्सर्जन को 40 प्रतिशत तक कम कर देता है। इससे नई इमारतों को तैयार करने में समय भी काफी घटता है और काम अधिक कुशल, तेज और भरोसेमंद बनता है।

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#4

सोलर ऊर्जा अनुमान में नई तकनीक

सोलर ऊर्जा के क्षेत्र में भी AI नई संभावनाएं लगातार खोल रहा है। ओपन क्लाइमेट फिक्स और ट्रिलाबोस जैसे संगठनों ने ऐसे उन्नत मॉडल बनाए हैं जो मौसम डाटा के आधार पर सोलर उत्पादन का सही और सटीक अनुमान लगाते हैं। इससे ग्रिड ऑपरेटर बेहतर योजना बना पाते हैं और अतिरिक्त फॉसिल फ्यूल के उपयोग से बचा जा सकता है, जिससे लागत कम होती है और पर्यावरण पर असर भी घटता है।

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