चांद से मंगल तक, नासा के ये मिशन क्यों हुए पूरी तरह असफल?
क्या है खबर?
अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने अंतरिक्ष विज्ञान में कई ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन उसके सभी मिशन सफल नहीं रहे। कुछ मिशन तकनीकी खराबी, डिजाइन की गलती या हादसों की वजह से असफल हुए। इन घटनाओं में कई अंतरिक्ष यात्रियों की जान भी गई। हालांकि, हर असफल मिशन से मिले अनुभवों ने नासा को अपनी तकनीक, सुरक्षा व्यवस्था और भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों को पहले से कहीं अधिक सुरक्षित और बेहतर बनाने में मदद की।
अपोलो
अपोलो मिशनों में हादसों ने बदली दिशा
अपोलो कार्यक्रम के दौरान नासा को दो बड़े झटके लगे।
वर्ष 1967 में अपोलो-1 के परीक्षण के समय कैप्सूल में आग लगने से तीन अंतरिक्ष यात्रियों की मौत हो गई। वहीं 1970 में अपोलो-13 के ऑक्सीजन टैंक में विस्फोट होने से चंद्रमा पर उतरने का मिशन रद्द करना पड़ा।
हालांकि, चालक दल सुरक्षित लौट आया, लेकिन इस घटना के बाद अंतरिक्ष यान की सुरक्षा और डिजाइन में कई बड़े बदलाव किए गए।
चैलेंजर
चैलेंजर और कोलंबिया हादसे ने झकझोरा
वर्ष 1986 में चैलेंजर स्पेस शटल उड़ान भरने के कुछ सेकंड बाद ही विस्फोट का शिकार हो गया, जिसमें सातों अंतरिक्ष यात्रियों की मौत हो गई।
इसके बाद 2003 में कोलंबिया शटल पृथ्वी पर लौटते समय टूट गया और उसमें सवार सभी सात लोगों की जान चली गई।
इन दोनों बड़े हादसों के बाद नासा ने सुरक्षा प्रक्रियाओं, तकनीकी जांच और अंतरिक्ष यानों की संरचना में व्यापक सुधार लागू किए।
मंगल
मंगल मिशन में छोटी गलती पड़ी भारी
मार्स क्लाइमेट ऑर्बिटर नासा के सबसे चर्चित असफल मिशनों में शामिल है।
वर्ष 1999 में मंगल ग्रह के पास पहुंचने से पहले ही उससे संपर्क टूट गया। जांच में पता चला कि माप की दो अलग-अलग प्रणालियों का इस्तेमाल होने से नेविगेशन में गलती हुई और यान मंगल के वातावरण में जल गया।
यह छोटी तकनीकी चूक नासा के लिए बड़ा सबक बनी और बाद की परियोजनाओं में ऐसी गलतियों से बचने पर विशेष ध्यान दिया गया।
स्काईलैब
स्काईलैब और कॉन्स्टेलेशन योजना भी नहीं चली
अमेरिका का पहला अंतरिक्ष स्टेशन स्काईलैब लॉन्च के तुरंत बाद तकनीकी खराबी का शिकार हो गया।
हालांकि, अंतरिक्ष यात्रियों ने मरम्मत कर उसे फिर चालू किया, लेकिन कई दिक्कतें लंबे समय तक बनी रहीं। दूसरी ओर, 2004 में शुरू किया गया कॉन्स्टेलेशन कार्यक्रम बजट की कमी, तकनीकी चुनौतियों और लगातार देरी के कारण 2010 में बंद कर दिया गया।
इसके बावजूद ओरियन यान का विकास आगे जारी रखा गया और बाद के मिशनों में उसका सफल परीक्षण भी किया गया।
वेंचरस्टार
वेंचरस्टार और नर्वा परियोजना रुक गई
दोबारा इस्तेमाल होने वाला अंतरिक्ष यान बनाने के लिए शुरू किया गया एक्स-33 वेंचरस्टार प्रोजेक्ट ईंधन टैंक की तकनीकी समस्याओं के कारण कभी उड़ान नहीं भर सका।
वहीं नर्वा परियोजना में परमाणु ऊर्जा से रॉकेट इंजन बनाने की योजना थी। शुरुआती परीक्षण सफल रहे, लेकिन सुरक्षा चिंताओं, बढ़ती लागत और बदलती प्राथमिकताओं के चलते इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम को भी आखिरकार बंद कर दिया गया।
इसके बाद इस तकनीक पर आगे काम नहीं बढ़ाया जा सका।
ओरियन
प्रोजेक्ट ओरियन भी नहीं हो सका पूरा
प्रोजेक्ट ओरियन का उद्देश्य परमाणु विस्फोटों की ऊर्जा से अंतरिक्ष यान को आगे बढ़ाना था।
वैज्ञानिकों का मानना था कि इससे बेहद लंबी अंतरिक्ष यात्राएं संभव हो सकती हैं। हालांकि, इस तकनीक में सुरक्षा जोखिम बहुत अधिक थे और परमाणु परीक्षणों पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लागू होने के बाद परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।
इसके बावजूद इन सभी असफल योजनाओं से मिले अनुभव आज भी आधुनिक अंतरिक्ष मिशनों की नींव मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।