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DRDO बनाएगा स्वदेशी बुलेटप्रूफ ग्लास, सैन्य वाहनों की बढ़ेगी सुरक्षा
DRDO बनाएगा स्वदेशी बुलेटप्रूफ ग्लास

DRDO बनाएगा स्वदेशी बुलेटप्रूफ ग्लास, सैन्य वाहनों की बढ़ेगी सुरक्षा

Sep 28, 2026
02:33 pm

क्या है खबर?

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने बख्तरबंद गाड़ियों के लिए स्वदेशी हल्का बुलेटप्रूफ ग्लास बनाने की तैयारी शुरू की है। इसके लिए DRDO ने CSIR-सेंट्रल ग्लास एंड सिरेमिक रिसर्च इंस्टीट्यूट के साथ हाथ मिलाया है। करीब 50 करोड़ रुपये की लागत वाला यह प्रोजेक्ट चार साल का है। इसमें महाराष्ट्र की NMRL और चंडीगढ़ की TBRL जैसी DRDO प्रयोगशालाएं भी शामिल हैं। इसका मकसद प्रयोगशाला में तैयार तकनीक को आगे बढ़ाकर बड़े स्तर पर उत्पादन तक पहुंचाना है।

वजन

वजन और मोटाई होगी कम

नई तकनीक से बख्तरबंद गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले आयातित पारदर्शी कवच का विकल्प तैयार किया जाएगा।

इसे मौजूदा विकल्पों की तुलना में हल्का और पतला बनाने पर जोर दिया जा रहा है। परियोजना से जुड़े वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्लास का वजन और मोटाई करीब 30 से 50 प्रतिशत तक कम करने का लक्ष्य है।

इससे बख्तरबंद गाड़ियों का कुल वजन घटेगा और उनकी चलने की क्षमता, ईंधन बचत तथा सामान ले जाने की क्षमता बेहतर हो सकती है।

परीक्षण

गोली रोकने में सफल परीक्षण

इस नए ग्लास-सिरेमिक में बेहद छोटे क्रिस्टल एक खास तरह के ग्लास के अंदर समान रूप से मौजूद होंगे। इससे पारदर्शिता बनाए रखते हुए सामग्री को मजबूत बनाने की कोशिश की गई है।

चंडीगढ़ स्थित DRDO की प्रयोगशाला में शुरुआती परीक्षण किए गए हैं। इनमें सामग्री ने त्रिची असॉल्ट राइफल से 10 मीटर की दूरी से करीब 695 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से चलाई गई गोली को सफलतापूर्वक रोक दिया।

अब आगे और कठिन परीक्षण होंगे।

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जांच

कई राउंड की होगी जांच

अगले चरण में इस सामग्री की क्षमता जांचने के लिए लगातार गोलियां दागकर परीक्षण किया जाएगा।

इसका मकसद यह पता लगाना है कि अलग-अलग परिस्थितियों में ग्लास-सिरेमिक कितना प्रभावी रहता है। तकनीक को बख्तरबंद वाहनों के अलावा विमान और नौसेना से जुड़े ऐसे प्लेटफॉर्म में भी इस्तेमाल किया जा सकता है, जहां वजन कम रखना जरूरी होता है।

परियोजना के जरिए प्रयोगशाला में तैयार तकनीक को भारतीय कंपनियों की मदद से बड़े पैमाने पर उत्पादन तक पहुंचाने की योजना है।

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