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क्या सच में धरती पर गिरा था चांद का हिस्सा? चंद्रयान-3 से ऐसे सुलझा रहस्य
चंद्रयान-3 से भारतीय वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है

क्या सच में धरती पर गिरा था चांद का हिस्सा? चंद्रयान-3 से ऐसे सुलझा रहस्य

Jul 06, 2026
07:38 pm

क्या है खबर?

चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक लैंडिंग के करीब 2 साल बाद भारतीय वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है। नए अध्ययन में पता चला है कि चंद्रयान-3 के प्रज्ञान रोवर ने चांद की जिस मिट्टी की जांच की, उसकी रासायनिक बनावट वर्षों पहले धरती पर मिले एक चंद्र उल्कापिंड से काफी मिलती है। इस खोज ने पहली बार चांद की सतह और धरती पर मिले उस खास पत्थर के बीच मजबूत वैज्ञानिक संबंध का अहम सबूत दिया है।

अध्ययन

PRL के अध्ययन में हुआ बड़ा खुलासा

अहमदाबाद की फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (PRL) के वैज्ञानिकों ने यह अध्ययन किया है। उन्होंने चंद्रयान-3 के शिव शक्ति स्टेशन से प्रज्ञान रोवर द्वारा जुटाए गए आंकड़ों की तुलना धरती पर मिले 66 चंद्र उल्कापिंडों से की। इनमें ALHA 81005 नाम का उल्कापिंड सबसे ज्यादा मेल खाता मिला। यह उल्कापिंड 1981-82 में अंटार्कटिका के एलन हिल्स इलाके में मिला था और इसे चांद से आया पहला प्रमाणित उल्कापिंड माना जाता है।

जांच

मिट्टी की जांच से मिला चांद का पुराना सुराग

प्रज्ञान रोवर ने शिव शक्ति स्टेशन की मिट्टी में मौजूद अलग-अलग तत्वों की जांच की। इस जांच में एल्यूमिनियम कम, जबकि मैग्नीशियम और आयरन अधिक मात्रा में मिले। साथ ही ओलिविन नाम का खनिज ज्यादा पाया गया। यही विशेषताएं ALHA 81005 उल्कापिंड में भी मौजूद थीं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे पता चलता है कि दोनों एक जैसी दुर्लभ चंद्र चट्टानों से जुड़े हुए हैं, हालांकि दोनों का स्थान अलग-अलग है।

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अनुमान

चांद की गहराई से आया हो सकता है यह पदार्थ

वैज्ञानिकों का मानना है कि चंद्रयान-3 की लैंडिंग साइट की मिट्टी केवल ऊपरी सतह की नहीं है। इसमें चांद की गहराई में मौजूद मैग्नीशियम से भरपूर चट्टानों के टुकड़े भी शामिल हो सकते हैं। माना जा रहा है कि ये चट्टानें दक्षिण ध्रुव-एटकेन बेसिन बनने के दौरान हुए विशाल टकराव के कारण सतह तक पहुंचीं। इससे चांद की आंतरिक संरचना को समझने में भी महत्वपूर्ण मदद मिल सकती है। यह इलाका लैंडिंग साइट से लगभग 350 किलोमीटर दूर स्थित है।

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पुराने सिद्धांत

पुराने वैज्ञानिक सिद्धांत को मिला नया समर्थन

यह अध्ययन लूनर मैग्मा ओशन सिद्धांत को भी मजबूत करता है। इस सिद्धांत के अनुसार, शुरुआती समय में पूरा चांद पिघली हुई चट्टानों के विशाल महासागर से ढका हुआ था। बाद में यह धीरे-धीरे ठंडा हुआ और अलग-अलग गहराई पर अलग खनिज बनने लगे। इस प्रक्रिया ने चांद की अलग-अलग परतों का निर्माण किया था। नई खोज से वैज्ञानिकों को चांद की परतों के बनने की प्रक्रिया को पहले से बेहतर समझने में मदद मिली है।

लाभ

क्या होगा इस अध्ययन से लाभ?

इस अध्ययन से यह समझना आसान होगा कि चांद की चट्टानें अंतरिक्ष में कैसे पहुंचीं और बाद में उनमें से कुछ धरती तक कैसे आईं। चंद्रयान-3 के आंकड़े चांद के भूवैज्ञानिक इतिहास, उसकी सतह और आंतरिक संरचना को समझने में नई जानकारी दे रहे हैं। साथ ही भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों की योजना बनाने में भी सहायता मिलेगी। यह खोज भविष्य के चंद्र अभियानों और अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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