भाजपा के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के सामने क्या होंगी बड़ी चुनौतियां?
क्या है खबर?
बिहार सरकार में मंत्री रहे नितिन नबीन भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए है। वह भाजपा के 12वें और सबसे युवा अध्यक्ष हैं। वह 45 साल की उम्र में राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने वाले भाजपा के पहले नेता हैं। हालांकि, उनके लिए राह आसान नही रहेगी क्योंकि उनके सामने पार्टी के वरिष्ठ और युवा नेताओं के साथ तालमेल बिठाने समेत पार्टी के वर्चस्व को बनाए रखने की चुनौतियां होंगी। आइए उनके सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों पर नजर डालते हैं।
कद
प्रधानमंत्री मोदी ने नबीन को बताया अपना बॉस
नबीन के मंगलवार को औपचारिक रुप से अध्यक्ष पद संभालने के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "मैं एक कार्यकर्ता हूं और वे (नितिन नबीन) मेरे बॉस हैं। अब नितिन नबीन जी हम सभी के अध्यक्ष हैं और उनका दायित्व सिर्फ भाजपा को संभालना ही नहीं है, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के सभी साथियों के बीच तालमेल का दायित्व भी देखना है।" प्रधानमंत्री मोदी के इस बयान ने नबीन के सामने आने वाली चुनौतियों को लेकर बड़ा संकेत दिया है।
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5 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव होगी पहली बड़ी चुनौती
राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नबीन के सामने पहली और बड़ी चुनौती इस साल पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में होने वाले विधानसभा चुनाव की होगी। असम और पुडुचेरी को छोड़कर अन्य जगहों पर भाजपा सत्ता में नहीं है। तमिलनाडु और केरल में भाजपा कमजोर है। पश्चिम बंगाल में पार्टी मुख्य विपक्ष जरूर है, लेकिन ममता बनर्जी की मजबूत पकड़ भाजपा के लिए बड़ी रुकावट है। ऐसे में वह इन राज्यों में बेहतर प्रदर्शन करना चाहेंगे।
सवाल
चुनाव के नतीजे तय करेंगे नबीन का कद
इन 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में जीत से ज्यादा अहम बात होगी कि भाजपा कैसा प्रदर्शन करती है। अगर नतीजे बहुत खराब रहे तो सीधे नबीन की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठेंगे। यही वजह है कि ये चुनाव उनके लिए अग्निपरीक्षा जैसे हैं। इन राज्यों में जीत से अधिक महत्वपूर्ण भाजपा का प्रदर्शन और वोट-शेयर रहेगा। इसी तरह सत्ता विरोधी लहर और क्षेत्रीय मुद्दों के बीच भाजपा की राष्ट्रीय रणनीति को स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाना कठिन कार्य होगा।
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जातिगत जनगणना भी बनेगी बड़ी चुनौती
नबीन के सामने दूसरी बड़ी चुनौती देश में पहली बार हो रही जातिगत जनगणना भी होगी, क्योंकि इसके परिणाम देश की राजनीति को प्रभावित करेंगे। कई राज्यों में राजनीतिक समीकरण बदलेंगे। अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और सवर्ण जातियों की सही संख्या पता चलेगी, जिसके कारण बनने वाले नए समीकरणों के साथ भाजपा को तालमेल बैठाना होगा। इसका कारण है कि पिछले कुछ सालों में देश की सियासत जातिगत राजनीति पर केंद्रित हुई है और इसमें जातियों का महत्व बढ़ा है।
जानकारी
महिलाओं के साथ भाजपा को आगे बढ़ाना होगा
जनगणना के बाद देश में लोकसभा और विधानसभा सीटों का परिसीमन होगा। विधानसभाओं और संसद में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होगा। ऐसे में महिलाओं को आगे लाने के साथ भाजपा को आगे लेकर जाना नबीन के लिए बड़ी चुनौती होने वाली है।
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पार्टी में पीढ़ीगत संतुलन को बनाए रखना
नबीन युवा हैं और भाजपा नेतृत्व उनसे उम्मीद करता है कि वे युवाओं को आगे बढ़ाएं। हालांकि, बड़ी परेशानी ये है कि भाजपा संगठन अभी वरिष्ठ अनुभवी नेताओं और पुराने ढांचे पर टिका है। अगर वे सिर्फ युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाते हैं तो वरिष्ठ नेताओं में नाराजगी हो सकती है। अनुभव की अनदेखी संगठन को नुकसान पहुंचा सकती है। ऐसे में उन्हें अपने ठोस फैसलों के साथ ऐसा नेतृत्व खड़ा करना होगा जिसमें युवा और अनुभव का मिश्रण हो।
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दक्षिण भारत में भाजपा का विस्तार
दक्षिण भारत चुनाव परिणामों के लिहाज से भाजपा की सबसे बड़ी कमजोरी है। तमिलनाडु और केरल में क्षेत्रीय और वैचारिक राजनीति भाजपा के खिलाफ है। द्रविड़ आंदोलन, भाषा और सामाजिक न्याय की राजनीति ने तमिलनाडु में भाजपा की राह कठिन बनाई है। केरल में वामपंथ और कांग्रेस का प्रभुत्व है। ऐसे में नबीन के सामने स्थानीय नेतृत्व, सांस्कृतिक मुद्दों की समझ और क्षेत्रीय राजनीति के साथ तालमेल बनाकर भाजपा को दक्षिण भारत में मजबूत संगठन बनाने की चुनौती होगी।
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भाजपा का RSS के साथ समायोजन बनाए रखना
नबीन के सामने एक चुनौती भाजपा का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के समायोजन बनाए रखने की होगी। जब भी RSS और भाजपा के बीच तालमेल कमजोर पड़ा है पार्टी की जमीनी ताकत पर असर पड़ा है। RSS भाजपा की वैचारिक और संगठनात्मक शक्ति का मुख्य स्रोत है। नबीन को यह सुनिश्चित करना होगा कि भाजपा और RSS के बीच हर हाल में समन्वय बना रहे क्योंकि किसी भी तरह का मतभेद चुनावों में पार्टी को बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है।
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NDA के सहयोगी दलों के साथ संतुलन
भाजपा अकेले नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के साथ चुनाव लड़ती है। भाजपा की राष्ट्रीय सफलता में NDA की अहम भूमिका रही है। अलग-अलग राज्यों में सहयोगी दलों की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं और महत्वाकांक्षाएं होती हैं। सीट बंटवारे, नेतृत्व के प्रश्न और क्षेत्रीय मुद्दों पर मतभेद स्वाभाविक हैं। नबीन को गठबंधन धर्म निभाते हुए भाजपा के हितों की रक्षा करनी होगी। उन्हें ध्यान रखना होगा कि कोई भी सहयोगी नाराज न हो। ऐसा होने पर पार्टी कमजोर होगी।
जानकारी
विरोधी लहर और आर्थिक असंतोष से निपटना
सरकार की नीतियों का असर सीधे पार्टी पर पड़ता है। महंगाई, बेरोजगारी और आम आदमी की परेशानियां विपक्ष का बड़ा हथियार होती हैं। नबीन को इन मुद्दों पर कार्यकर्ताओं को तैयार कर लोगों से संवाद बढ़ाना होगा। इससे लोगों का पार्टी पर विश्वास बना रहेगा।
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नेतृत्व को लेकर होगी सबसे बड़ी चुनौती
प्रधानमंत्री मोदी की उम्र लोकसभा चुनाव 2029 में 80 साल के करीब होगी। ऐसे में भाजपा के नेतृत्व मोदी के बाद कौन करेगा, इस सवाल से भी नबीन को जूझना होगा। 2013 में मोदी के नाम का चयन भी आम सहमति से नहीं हुआ था। अमित शाह को भाजपा में नंबर दो की हैसियत में देखा जाता है, लेकिन उनकी स्वीकार्यता पर सर्वसम्मति बनाना बड़ी चुनौती होगी। शाह को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के रूप में कड़ी चुनौती मिलने वाली है।