महाराष्ट्र में प्रसिद्ध हैं ये पारंपरिक संगीत वाद्य यंत्र, जानिए इनकी खासियत
क्या है खबर?
महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य है, जो अपनी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के लिए जाना जाता है। यहां का संगीत बिना वाद्य यंत्रों के अधूरा है। ये संगीत वाद्य यंत्र न केवल भारत में, बल्कि विश्व स्तर पर भी अपनी खास पहचान रखते हैं। इनकी धुन और सुर सुनकर मन को एक अलग ही सुकून मिलता है। आज हम आपको महाराष्ट्र के 6 प्रमुख संगीत वाद्य यंत्रों के बारे में बताने वाले हैं, जिनके जरिए ही गीतों में जान आती है।
#1
संतूर
संतूर एक प्रकार का तार वाला वाद्य यंत्र है, जिसे लकड़ी से बनाया जाता है। यह मुख्य रूप से कश्मीरी पंडितों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन महाराष्ट्र में भी इसका उपयोग बढ़ रहा है। संतूर की धुनें बहुत ही मधुर और मनमोहक होती हैं, जो सुनने वालों को एक अलग ही दुनिया में ले जाती हैं। इसके तारों पर हल्के-हल्के हाथ मारकर इसे बजाया जाता है, जिससे सुरीली धुनें निकलती हैं।
#2
ढोलकी और ढोल
ढोलकी महाराष्ट्र का एक पारंपरिक ड्रम है, जिसका उपयोग विभिन्न त्योहारों और उत्सवों में किया जाता है। इसके 2 सिर होते हैं, जिनमें से एक छोर मोटा होता है। वहीं, दूसरा सिरा पतला होता है और इस वाद्य यंत्र को हाथों से बजाय जाता है। इसके अलावा ढोल और ताशा भी मराठी संस्कृति का अहम हिस्सा हैं। ढोल बढ़ा ड्रम होता है, जिसे 2 स्टिक की मदद से बजाया जाता है। इसे आपने गणेशोत्सव के दौरान जरूर सुना होगा।
#3
शहनाई
शहनाई लकड़ी और धातु से बना एक पारंपरिक वाद्य यंत्र है, जो मराठी गानों में इस्तेमाल होता है। यह एक वायु वाद्य यंत्र है, यानि कि इसमें फूंककर इसे बजाय जाता है। इसे ऐतिहासिक तौर पर राजाओं की सभा में बजाया जाता था। हालांकि, अब यह हर शादी-ब्याह में सुनाई देता ही है। शहनाई लगभग 12-18 इंच लंबी होती है, जो शीशम की लकड़ी से बनी होती है और नीचे की तरफ धातु की घंटी लगी होती है।
#4
लेजिम
आपने देखा होगा कि महाराष्ट्र की महिलाएं पारंपरिक डांस करते समय हाथों में एक छोटा वाद्य यंत्र लिए रहती हैं। इसे लेजिम कहा जाता है, जिसके नाम पर इस डांस का भी नाम रखा गया है। यह एक छोटी डंडी वाला वाद्य यंत्र है, जिस पर छोटी-छोटी झांझर लगी होती हैं। इनके हिलने पर ये आपस में टकराती हैं और एक मधुर और मीठी ध्वनि पैदा करती हैं। इसे कुछ हद तक मंजीरे जैसा समझा जाता है।
#5
तुतारी
तुतारी महाराष्ट्र का एक पारंपरिक मुड़ा हुआ पीतल का वाद्य यंत्र होता है। शहनाई की तरह इसे भी फूंककर बजाया जाता है। इसका उपयोग ऐतिहासिक रूप से राजाओं के आगमन की घोषणा करने और जीत का जश्न मनाने के लिए किया जाता था। इस वाद्य यंत्र से एक भीनी और तेज आवाज उत्पन्न होती है, जो काफी दूर तक सुनाई देती है। इसका बीच का हिस्सा पतला होता है और एक सिरा बड़ा होता है, जिससे ध्वनि निकलती है।