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क्या है ईओसिनोफिलिक एसोफैगाइटिस? जानिए इस बीमारी से जुड़ी सारी अहम बातें
ईओसिनोफिलिक एसोफैगाइटिस के बारे में सबकुछ

क्या है ईओसिनोफिलिक एसोफैगाइटिस? जानिए इस बीमारी से जुड़ी सारी अहम बातें

लेखन सयाली
Jun 19, 2026
05:33 pm

क्या है खबर?

ईओसिनोफिलिक एसोफैगाइटिस (EoE) एक ऐसी बीमारी है, जो खाने की नली को प्रभावित करती है। इस बीमारी में सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या बढ़ जाती है, जिससे खाने की नली में सूजन और जलन होती है। इससे खाने-पीने में दिक्कत हो सकती है और कई अन्य समस्याएं भी हो सकती हैं। इस लेख में हम इस बीमारी से जुड़ी अहम बातें जानेंगे, जिससे आपको इसके बारे में बेहतर समझ मिल सके और आप इससे बचाव के उपाय जान सकें।

लक्षण

EoE के लक्षण

EoE के लक्षणों में निगलने में दर्द या कठिनाई होना, खाने-पीने के समय अटका हुआ महसूस होना, छाती में जलन होना, उल्टी आना या पेट फूलना, भूख कम लगना या खाने का मन न करना और बच्चों में विकास संबंधी समस्याएं होना शामिल हो सकता है। अगर आपको इनमें से कोई भी लक्षण महसूस हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें, ताकि समय पर इलाज किया जा सके और सही निदान भी हो सके।

कारण

इस बीमारी का कारण क्या है?

EoE का मुख्य कारण अभी तक पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो पाया है। हालांकि, शोध बताते हैं कि यह बीमारी आनुवंशिकता, एलर्जी प्रतिक्रिया, संक्रमण या पर्यावरणीय कारकों के कारण हो सकती है। इस बीमारी में सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या बढ़ जाती है, जो खाने की नली में सूजन और जलन का कारण बनती है। इसके अलावा कुछ खाद्य पदार्थों या अन्य तत्वों से होने वाली एलर्जी भी इस बीमारी को बढ़ावा दे सकती है।

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निदान

इस बीमारी का निदान

EoE का निदान करने के लिए डॉक्टर आमतौर पर एंडोस्कोपी करते हैं, जिसमें एक पतली ट्यूब को गले के माध्यम से पेट तक पहुंचाया जाता है। इससे खाने की नली के अंदरूनी हिस्से को देखा जाता है। बायोप्सी से भी इसका पता चलता है, जिसमें एंडोस्कोपी के दौरान खाने की नली के ऊतकों का नमूना लिया जाता है और प्रयोगशाला में जांचा जाता है, ताकि सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या का पता चल सके। इम्यूनोलॉजिकल परीक्षण भी किया जाता है।

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इलाज

EoE का इलाज

EoE के इलाज में मुख्य रूप से सूजन कम करने वाली दवाइयां या स्टेरॉयड दवाइयों का सेवन करने की सलाह दी जाती है, जो सूजन को कम करती हैं और राहत प्रदान करती हैं। इसके अलावा आहार परिवर्तन भी सुझाया जाता है, जिनमें एलर्जी पैदा करने वाले खानों का सेवन कम किया जाता है। इसके अलावा नियमित रूप से एंडोस्कोपी और बायोप्सी का सहारा लिया जा सकता है, ताकि स्थिति की निगरानी की जा सके।

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