शी जिनपिंग 7 साल बाद आएंगे भारत, प्रधानमंत्री मोदी के साथ बैठक के क्या रहेंगे मुद्दे?
क्या है खबर?
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग शनिवार को 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत पहुंच रहे हैं। जून 2020 में हुई गलवान घाटी हिंसा के बाद दोनों देशों के बीच उपजे गंभीर सैन्य गतिरोध के बाद जिनपिंग का यह पहला भारत दौरा होगा। वह पिछली बार अक्टूबर 2019 में अनौपचारिक शिखर सम्मेलन के लिए महाबलिपुरम आए थे। इस दौरान वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक द्विपक्षीय बैठक भी करेंगे। आइए उसके मुद्दों पर नजर डालते हैं।
नजर
जिनपिंग की इस यात्रा पर बारीकी से रखी जा रही है नजर
वर्षों के सैन्य टकराव और स्पष्ट राजनयिक अविश्वास के बाद इन 2 एशियाई शक्तियों के बीच सावधानीपूर्वक हो रहे मेल-मिलाप की यह दौरा महत्वपूर्ण परीक्षा होगी।
भारत और चीन द्वारा संबंधों को सामान्य बनाने के प्रयासों के बीच हो रही जिनपिंग की यात्रा पर बारीकी से नजर रखी जाएगी ताकि यह पता चल सके कि क्या दोनों देश अपने संबंधों को स्थिर करने से आगे बढ़कर एक व्यापक राजनीतिक और आर्थिक पुनर्समापन की ओर बढ़ सकते हैं।
वार्ता
शनिवार शाम 6 बजे होगी प्रधानमंत्री मोदी और जिनपिंग की वार्ता
इंडिया टुडे के अनुसार, जिनपिंग शनिवार शाम 6 बजे प्रधानमंत्री मोदी के साथ एक बेहद महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक करेंगे।
इसमें वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर व्याप्त सीमा विवाद पर प्रमुखता से चर्चा होगी।
2020 के सैन्य टकराव के बाद से दोनों देशों के बीच LAC पर तनाव है।
हालांकि, अक्टूबर 2024 में पेट्रोलिंग व्यवस्था पर बनी सहमति के बाद संबंध सुधरे हैं, लेकिन यह बैठक दीर्घकालिक शांति की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है।
प्रयास
संबंध सुधारने के लिए लगातार किए जा रहे हैं प्रयास
प्रधानमंत्री मोदी और जिनपिंग लगातार संबंध सुधारने का प्रयास कर रहे हैं। कजान में BRICS सम्मेलन में औपचारिक वार्ता के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अगस्त 2025 में चीन का दौरा किया।
उसके बाद दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें फिर से शुरू की गई।
भारत ने चीनी व्यापार पेशेवरों के लिए वीजा प्रक्रियाओं में भी ढील दी और चीन ने तिब्बत में कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू करने की अनुमति देकर संबंधों को सुधारने का प्रयास किया है।
विवाद
अभी केंद्र में है सीमा विवाद
दोनों देशों के बीच सीमा विवाद अब भी केंद्र में बना हुआ है।
अगस्त में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल ने चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता के 25वें दौर के लिए बीजिंग की यात्रा की।
चर्चा में सीमा, सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने और संबंधों को बेहतर बनाने के व्यापक उपायों पर विचार-विमर्श किया गया।
ऐसे में मोदी-जिनपिंग की वार्ता में भी इसी प्रयास को आगे बढ़ाया जाएगा।
व्यापार
भारत का व्यापार घाटा कम करने पर हो सकती है चर्चा
इस वार्ता में दोनों देशों के व्यापार संतुलन पर भी चर्चा हो सकती है।
वित्तीय वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 151 अरब डॉलर (लगभग 14.34 लाख करोड़ रुपये) का रहा।
इसमें भारत ने चीन से 131 अरब डॉलर (लगभग 12.52 लाख करोड़ रुपये) का आयात किया, जबकि निर्यात महज 19 अरब डॉलर (लगभग 1.81 लाख करोड़ रुपये) रहा, जिससे 112 अरब डॉलर (लगभग 10.72 लाख करोड़ रुपये) का रिकॉर्ड व्यापार घाटा पैदा हुआ है।
चिंता
जलविद्युत परियोजना और बुनियादी ढांचागत चिंताएं
भारत के लिए सीमा के अलावा चीन की जलविद्युत परियोजना और बुनियादी ढांचागत चिंताएं भी हैं।
चीन ने जुलाई 2025 में तिब्बत में अरुणाचल प्रदेश सीमा पर 'यारलुंग त्सांगपो' (भारत में ब्रह्मपुत्र) नदी पर मेडोग जलविद्युत परियोजना का निर्माण शुरू किया है।
यह परियोजना साल 2033 तक पूरी होनी है, जिसकी क्षमता 60,000 मेगावाट होगी।
भारत इस परियोजना में पारदर्शिता और पर्यावरणीय डाटा साझा करने की मांग कर रहा है। ऐसे में इस मुद्दे पर भी चर्चा हो सकती है।
कारक
अमेरिकी कारक और क्वाड
विशेषज्ञों के अनुसार, यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब भारत और चीन दोनों ही अमेरिका की नई व्यापार व सख्त टैरिफ नीतियों का सामना कर रहे हैं।
यही कारण है कि दोनों पक्ष अपने रणनीतिक मतभेदों के बावजूद एक व्यावहारिक कामकाजी संबंध बनाए रखने के इच्छुक हैं।
हालांकि, चीन अभी भारत की अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड साझेदारी को संदेह जताता है, जबकि भारत चीन और पाकिस्तान की करीबी से सतर्क रहता है।
परीक्षा
मोदी-जिनपिंग वार्ता होगी विश्वास बहाली की परीक्षा
प्रधानमंत्री मोदी और जिनपिंग की मुलाकात 2020 के बाद पैदा हुई कड़वाहट को दूर कर आपसी विश्वास बहाल करने की असली परीक्षा है।
इस बैठक से सीमा प्रबंधन, व्यापार और निवेश को नई गति मिल सकती है।
भारत के लिए सबसे अहम परीक्षा यह होगी कि क्या चीन सीमा पर स्थिरता और व्यापारिक निश्चितता सुनिश्चित करता है।
वहीं, चीन यह भरोसा दिलाना चाहेगा कि इस आर्थिक जुड़ाव से कोई नई रणनीतिक कमजोरी पैदा नहीं होगी।