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क्या ऑयल बॉन्ड कर्ज के चुकता होने से भारत में सस्ता हो जाएगा पेट्रोल-डीजल?
ऑयल बॉन्ड कर्ज के चुकने से पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम होने की उम्मीद है

क्या ऑयल बॉन्ड कर्ज के चुकता होने से भारत में सस्ता हो जाएगा पेट्रोल-डीजल?

Mar 18, 2026
01:33 pm

क्या है खबर?

भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम न होने की समस्या का समाधान होता दिख रहा है। दरअसल, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने कई बार पेट्रोल-डीजल के दाम कम न कर पाने के लिए UPA सरकार द्वारा छोड़े गए ऑयल बॉन्ड कर्ज को जिम्मेदार ठहराया था। अब वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया है कि सरकार ने वह कर्ज चुका दिया है। ऐसे में आइए जानते हैं कि क्या अब देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम होंगी।

ऑयल बॉन्ड

क्या हैं ऑयल बॉन्ड और इनका इतिहास?

न्यूज18 के अनुसार, साल 2014 से पहले कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने के बाद तत्कालीन UPA सरकार ने तेल कंपनियों को नकद सब्सिडी की जगह प्रॉमिसरी नोट्स या बॉन्ड देने का रास्ता निकाला था। यह एक तरह का उधार था, जिसे सरकारों को ब्याज सहित चुकाना था। इसे ही ऑयल बॉन्ड कर्ज कहा जाता है। साल 2005 से 2010 के बीच लगभग 1.34 लाख करोड़ रुपये के ऐसे बॉन्ड जारी किए गए थे।

दावा

वित्त मंत्री ने क्या किया दावा?

वित्त मंत्री सीतारमण का तर्क रहा है कि इन बॉन्ड पर भारी ब्याज और इनके मूलधन को चुकाने के कारण सरकारी खजाने पर भारी दबाव रहा है। हालांकि, अब सरकार ने इन बॉन्ड का बकाया और ब्याज को चुका दिया है। वित्त मंत्री सीतारमण ने राज्यसभा में बताया कि केंद्र सरकार ने UPA शासन के दौरान जारी किए गए 2.92 लाख करोड़ रुपये के ऑयल बॉन्ड का बोझ (मूलधन और ब्याज सहित) मार्च 2026 तक पूरी तरह चुका दिया है।

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बॉन्ड

UPA सरकार ने कितने बॉन्ड हुए थे जारी?

वित्त मंत्री सीतारमण ने बताया कि 2004 से 2010 के बीच UPA सरकार ने 1.48 लाख करोड़ रुपये के बॉन्ड जारी किए थे, जिन्हें बजट से बाहर रखा गया था। उन्होंने बताया कि इन पुराने कर्जों को चुकाने की वजह से राजकोषीय स्थिति पर दबाव पड़ा, अन्यथा यह पैसा देश के भविष्य जैसे कि अस्पतालों, स्कूलों और बुनियादी ढांचों पर खर्च किया जा सकता था। उन्होंने वर्तमान अर्थव्यवस्था को पहले की तुलना में अधिक पारदर्शी और मजबूत बताया है।

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हकीकत

क्या ऑयल बॉन्ड के कारण ही कम नहीं हो रहे थे पेट्रोल-डीजल के दाम?

सरकार के दावों के अनुसार, ऑयल बॉन्ड भले ही एक वित्तीय बोझ थे, लेकिन 2014 से 2023 के बीच केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क से 20-25 लाख करोड़ रुपये की कमाई की है। बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट और संसद में दिए गए एक सरकारी जवाब से पता चलता है कि 2014 में पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 9.48 रुपये प्रति लीटर था, जो मई 2020 में बढ़कर 32.98 रुपये प्रति लीटर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।

आंकड़े

क्या कहते हैं PPAC के आंकड़े?

पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ (PPAC) के आंकड़ों के मुताबिक, 2020-21 में उत्पाद शुल्क 3.72-3.84 लाख करोड़ रुपये के सर्वोच्च स्तर पर रहा, जो 2019-20 की तुलना में 67 प्रतिशत अधिक था। मार्च 2021 में तत्कालीन राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने लोकसभा में बताया था कि 2014-15 में सरकार ने पेट्रोल पर 29,279 करोड़ और डीजल पर केवल 42,881 करोड़ रुपये का ही उत्पाद शुल्क वसूला था, जो 2020-21 के पहले 10 महीनों में 2.94 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया।

गुमराह

क्या सरकार ने जनता को किया गुमराह?

इन आंकड़ों के हिसाब से साफ है कि ऑयल बॉन्ड का कुल बकाया लगभग 1.48 लाख करोड़ रुपये था, जबकि सरकार की पेट्रोल-डीजल पर लगाए गए उत्पाद शुल्क से हुई कमाई 20 से 25 लाख करोड़ रुपये तक रही है। कांग्रेस ने कई बार आरोप लगाए हैं कि केंद्र सरकार केवल UPA सरकार पर ऑयल बॉन्ड कर्ज का आरोप लगाकर तेल की कीमतों को कम करने के जनता के दबाव से बचने का प्रयास करती है, जबकि हकीकत अलग है।

उम्मीद

क्या अब कम होंगे पेट्रोल-डीजल के दाम?

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बड़ी गिरावट की संभावना न के बराबर है। इसकी मुख्य वजह यह है कि सरकार तेल को राजस्व का एक सुरक्षित जरिया मानती है। हालांकि, सरकार अब कम से कम बॉन्ड के नाम पर कीमतों को ऊंचा रखने का तर्क तो नहीं दे पाएगी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 70-75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहने पर कीमतों में कुछ कटौती के बारे में सोच सकती है।

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