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भजनों के संरक्षण में जीवन समर्पित करने वाले तिरुत्तानी स्वामीनाथन कौन हैं, जिनको मिलेगा 'पद्मश्री'?
थेवरम भजनों के संरक्षण में जीवन समर्पित करने वाले तिरुत्तानी स्वामीनाथन

भजनों के संरक्षण में जीवन समर्पित करने वाले तिरुत्तानी स्वामीनाथन कौन हैं, जिनको मिलेगा 'पद्मश्री'?

लेखन गजेंद्र
May 22, 2026
11:41 am

क्या है खबर?

तमिलनाडु की पारंपरिक तमिल संगीत शैली को जीवित रखने वाले 80 वर्षीय तिरुत्तानी स्वामीनाथन को कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए 'पद्मश्री' पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। उनको राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 25 मई को राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में सम्मानित करेंगी। स्वामीनाथन एक प्रमुख तमिल कलाकार, ओधुवर गायन विशेषज्ञ और सांस्कृतिक संरक्षक हैं। वे धर्मपुरम आदीनम के थेवरम पाठशाला के प्रमुख भी हैं। आइए, स्वामीनाथन के जीवन और उनकी उपलब्धियों के बारे में जानते हैं।

पहचान

बचपन में ही संगीत की दुनिया में प्रवेश

स्वामीनाथ का जन्म 1946 में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम सरंगपाणि था। वे अलाथुर गांव से जुड़े हैं। उन्होंने घर की आर्थिक तंगी के कारण 14 वर्ष की आयु में आठवीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़ दिया। हालांकि, इससे उन्हें फर्क नहीं पड़ा क्योंकि उनका झुकाव संगीत की ओर था। इस दौरान, उनके पिता उन्हें एक संगीत कार्यक्रम में ले गए, जहां मदुरै सोमू जैसे कलाकारों के प्रभाव में उनका जीवन बदल गया।

प्रवेश

सारंगपाणी से बने स्वामीनाथन

द हिंदू के मुताबिक, एक दिन गायक मदुरै सोमू के ससुर ने उन्हें गाते सुना और प्रभावित हुए। उनके सुझाव पर स्वामीनाथन ने तिरुक्कडैयूर के पिचाई कट्टलाई एस्टेट थेवारा स्कूल में दाखिला लिया, जहां 5 साल तक पढ़ाई की। इसके बाद, उन्होंने धर्मपुरम अधीनम स्कूल में 2 साल तक संगीत का प्रशिक्षण जारी रखा। इसी दौरान अधीनम के मठाधीश ने उन्हें एक नया नाम दिया। वे सारंगपाणी की बजाए स्वामीनाथन के नाम से जाने जाने लगे।

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उपलब्धि

स्वामीनाथन को याद हैं 9,000 गीत

स्वामीनाथन ने 13-14 वर्ष की आयु में थेवरम और तिरुवासगम गीत सीखने शुरू किए और धर्मपुरम आदीनम की थेवरम पाठशाला में 5-8 वर्षों तक कठोर प्रशिक्षण लिया। उन्हें आज तक लगभग 9,000 भक्ति गीत पूरी तरह याद हैं। उन्होंने अपने जीवन के 55 साल पारंपरिक तमिल संगीत के लिए समर्पित कर दिए। उन्होंने 100 से अधिक एल्बम जारी किए और भारत भर के मंदिरों में 26 से अधिक वर्षों तक नियमित भजन प्रस्तुत किए।

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खास

स्वामीनाथन की क्या है उपलब्धि?

स्वामीनाथन तिरुमुरै एवं थेवरम गीतों के प्रख्यात गायक और विशेषज्ञ हैं। मंदिरों में रोजाना पूजा, उत्सव और अनुष्ठानों में थेवरम गाया जाता है, जिसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। स्वामीनाथन के लिए थेवरम गायन कोई व्यावसाय नहीं निस्वार्थ सेवा है। वे तमिल की प्राचीन संगीत शैली (पण्) इसाई परंपरा के संरक्षक हैं। यह आधुनिक कर्नाटक संगीत से भी पुरानी है। स्वामीनाथन की मौखिक परंपरा ओधुवर द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से सिखाया और गाया जाता है।

पहचान

तिरुमुरै और थेवरम क्या है?

तिरुमुरै और थेवरम सिर्फ संग्रह नहीं बल्कि तमिल भक्ति संस्कृति, प्राचीन संगीत, साहित्य और दार्शनिक चिंतन का अनुपम संगम हैं। तिरुमुरै का अर्थ 'पवित्र मार्ग' या 'पवित्र संग्रह' है। यह 12 खंडों का एक विशाल संग्रह है, जिसमें 6वीं से 11वीं शताब्दी के बीच तमिल भाषा में शिव की स्तुति में रचित भक्ति गीत, कविताएं और दार्शनिक ग्रंथ शामिल हैं। थेवरम तिरुमुरै के पहले 7 खंड है, जिसमें 8,000 छंद और सैकड़ों भजन शामिल हैं।

ट्विटर पोस्ट

एन स्वामीनाथन का परिचय

सम्मान

जमीन से जुड़े लोगों को समर्पित पद्म पुरस्कार

इस बार #PeoplesPadma के तहत सरकार ने नामी लोगों को नहीं बल्कि जमीनी स्तर पर काम कर रही प्रतिभाओं को प्राथमिकता दी है। इस बार पद्म पुरस्कारों के लिए 84 जिलों के कुल 131 लोगों को चुना गया है। इसमें 5 'पद्म विभूषण', 13 'पद्म भूषण' और 113 लोग 'पद्मश्री' के लिए चयनित हैं। तमिलनाडु के 13 लोगों को सम्मान मिला है, जिसमें सामाजिक कार्य के लिए एसकेएम मैइलानंदन और चिकित्सा क्षेत्र में केआर पलानीस्वामी को 'पद्म भूषण' मिला है।

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