चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट के जजों में मतभेद, CJI के पास पहुंचा मामला
क्या है खबर?
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट की 2 न्यायाधीशों की पीठ ने सुनवाई की, लेकिन कोई फैसला नहीं हो सका। पीठ को फैसला करना था कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति को नियंत्रित करने वाले कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को 5 न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ के पास भेजना चाहिए। इस पर न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा की राय में मतभेद था।
सुनवाई
दोनों न्यायाधीशों ने क्या दी राय?
केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत मांग की कि CEC और EC की नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल अधिनियम, 2023 को चुनौती देने वाली याचिकाओं को उच्च पीठ के पास भेजा जाए।
न्यायमूर्ति दत्ता और न्यायमूर्ति शर्मा की पीठ ने 30 जुलाई को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा कि इसे बड़ी पीठ के पास भेजने की आवश्यकता नहीं, वहीं न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि इसका निर्णय बड़ी पीठ द्वारा होना चाहिए।
विवाद
न्यायमूर्ति दत्ता ने क्या टिप्पणी की?
न्यायमूर्ति दत्ता ने फैसला सुनाते हुए कहा, "हमने इन याचिकाओं पर 5 दिनों से अधिक समय तक सुनवाई की, एकमत होकर बोलना संस्थागत एकता की आवाज को दर्शाता। दुर्भाग्यवश, हमारी राय अलग-अलग है। संवैधानिक व्यवस्था का यह मूलभूत सिद्धांत है कि शासक कानून से बंधे होते हैं, उससे ऊपर नहीं।"
उन्होंने आगे कहा, "चुनाव आयोग का स्वतंत्र होना ही पर्याप्त नहीं है। आयोग को स्वतंत्र दिखना भी चाहिए।"
बयान
चयन समिति में विपक्ष की भूमिका दिखावटी- दत्ता
न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा, "प्रधानमंत्री द्वारा नामित मंत्री से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह अपने ही नामितकर्ता की अवहेलना करे। यह उम्मीद करना निराधार है कि मंत्रिमंडल का कोई मंत्री नेता सरकार से असहमत रुख अपनाएगा। मंत्रिमंडल मंत्रियों को शामिल करने से वह स्वतंत्र संतुलन नहीं मिल पाता जो एक निष्पक्ष चयनकर्ता प्रदान करता है।"
उन्होंने कहा, "कैबिनेट मंत्री केवल अपने नेता की बात दोहराएगा, जिससे चयन समिति में नेता प्रतिपक्ष की उपस्थिति दिखावटी हो जाती है।"
फैसला
न्यायमूर्ति शर्मा ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति शर्मा ने न्यायमूर्ति दत्ता की टिप्पणियों से असहमति व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इस मामले में कानून का एक महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल है, जिसका निर्णय एक बड़ी पीठ द्वारा किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान मतों में मतभेद को देखते हुए, पीठ ने आदेश दिया कि इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के समक्ष रखा जाएगा।
वह विचार करेंगे कि इस मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए संविधान पीठ का गठन किया जाना चाहिए या नहीं।
मामला
क्या है मामला?
दिसंबर 2023 को संसद से कानून पारित किया गया कि CEC-EC की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक समिति की सलाह पर होगी, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष और केंद्रीय कैबिनेट का एक मंत्री शामिल होगा।
कानून बनने तक सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि जब तक समिति नहीं बनती, तब तक चुनाव आयोग में नियुक्तियां प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और CJI की समिति करेगी।
कानून बनने पर समिति में सरकार का बहुमत हो गया, जिसे चुनौती दी गई है।