सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामला: बॉम्बे हाई कोर्ट में 22 आरोपियों की रिहाई के खिलाफ याचिका खारिज
क्या है खबर?
महाराष्ट्र की बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और उनके सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की फर्जी मुठभेड़ में हुई हत्याओं के मामले में सभी 22 आरोपियों की रिहाई को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अंखड़ की खंडपीठ ने बरी करने के फैसले को बरकरार रखते हुए शेख के भाइयों रुबाबुद्दीन और नायबुद्दीन द्वारा दायर अपीलों को खारिज किया है। सभी 22 आरोपियों में 21 पुलिसकर्मी हैं।
अपील
दोनों शेख भाईयों ने क्या दिया था तर्क?
भाईयों ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करने या वैकल्पिक रूप से, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 386(ए) के तहत पुनर्विचार के निर्देश देने की मांग की थी। उन्होंने तर्क दिया कि मुकदमा त्रुटिपूर्ण था और इसे ऐसे संचालित किया गया, जिससे न्याय के उद्देश्य विफल हो गए। उन्होंने तर्क दिया कि विशेष न्यायाधीश ने अपना निर्णय निराधार मान्यताओं और साक्ष्यों के गलत मूल्यांकन पर किया। उनकी अपील 2019 से लंबित थीं और 2025 में फैसला आना था।
पत्र
भाईयों ने मंत्रालयों को भी लिखा था पत्र
बार एंड बेंच के मुताबिक, परिवार खोने वाले पीड़ित की हैसियत से अपील दायर करने वाले शेख भाईयों ने अपनी अपील में उन मजिस्ट्रेटों को भी तलब करने की मांग की थी, जिनके समक्ष प्रमुख विरोधी गवाहों ने बयान दिए थे। उन्होंने याचिका दायर करने से पहले गृह मंत्रालय, CBI और कैबिनेट सचिव को भी पत्र लिखकर फैसले को चुनौती देने का आग्रह किया था। इस बीच, CBI ने हाईकोर्ट में कहा कि उसने फैसले को स्वीकार कर लिया है।
घटना
क्या है सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामला?
23 नवंबर, 2005 में वांछित अपराधी सोहराबुद्दीन शेख, कौसर बी, प्रजापति को हैदराबाद-सांगली लग्जरी बस से अगवा कर लिया गया था। CBI ने दावा किया कि शेख और प्रजापति को बाद में पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ों में मार गिराया, जबकि कौसर की हत्या कर शव ठिकाने लगाया गया। मामले में मौजूदा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी आरोपी थे। मामला गुजरात में दर्ज था। हालांकि, CBI के अनुरोध पर 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे मुंबई स्थानांतरित कर दिया था।
बरी
2018 में सभी आरोपी हुए थे बरी
मुकदमे का नेतृत्व कर रहे न्यायाधीश बीएच लोया की 2014 में मौत हो गई, जिस पर सवाल उठे। इसमें दूसरे न्यायाधीश एमबी गोसावी ने दिसंबर 2014 में शाह को मामले से बरी कर दिया। दिसंबर 2018 को CBI के विशेष न्यायाधीश एसजे शर्मा ने सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया। आरोपियों में गुजरात, राजस्थान, आंध्र प्रदेश के सेवारत-सेवानिवृत्त पुलिसकर्मी शामिल थे। निचली अदालत ने निष्कर्ष निकाला था कि साजिश-हत्या के आरोपों को संतोषजनक ढंग से साबित नहीं किया गया।
जानकारी
मुकर गए थे 92 गवाह
मुकदमे की सुनवाई के दौरान 210 गवाहों से पूछताछ हुई थी। बाद में 92 गवाह मुकर गए। अपने 358 पृष्ठों के फैसले में, ट्रायल जज ने मृतकों के प्रति संवेदना जताई और फैसले में निर्णायक सबूतों की गंभीर कमी का हवाला दिया था।