LOADING...
सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करना नहीं हो सकता निष्कासन का आधार - बॉम्बे हाई कोर्ट
बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुंबई पुलिस की ओर से एक नेता के खिलाफ जारी निष्कासन आदेश को रद्द कर दिया है

सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करना नहीं हो सकता निष्कासन का आधार - बॉम्बे हाई कोर्ट

Jul 03, 2026
10:33 am

क्या है खबर?

बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को मुंबई पुलिस को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने पुलिस के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें एक राजनीतिक कार्यकर्ता को एक साल के लिए शहर से निष्कासित करने को कहा था। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केंद्र या राज्य सरकार के निर्णयों के खिलाफ मात्र मोर्चा या विरोध प्रदर्शन आयोजित करना किसी के निष्कासन का आधार नहीं हो सकता है। यह पूरी तरह से व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

प्रकरण

क्या है निष्कासन का पूरा मामला?

मुंबई पुलिस द्वारा सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के महासचिव और कैंबूर निवासी सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी के खिलाफ 2019 और 2024 के बीच 5 मुकदमें दर्ज किए गए थे। चौधरी ने संसदीय चुनाव भी लड़ा था। उनके खिलाफ ये मामले नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC), ज्ञानवापी मस्जिद, बाबरी मस्जिद विवाद, वक्फ बोर्ड में भ्रष्टाचार और ईंधन की बढ़ती कीमतों जैसे मुद्दों पर केंद्र सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन को लेकर दर्ज किए गए थे।

कार्रवाई

पुलिस ने चौधरी को किया एक साल के लिए निष्कासित

इन मामलों में जोन-6 के पुलिस उपायुक्त (DCP) ने 3 दिसंबर, 2025 को चौधरी को मुंबई शहर, उसके उपनगरों और आसपास के क्षेत्रों से एक साल के लिए निष्कासित करने का आदेश दिया था। चौधरी ने आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। चौधरी की याचिका में दावा किया गया कि सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन को लेकर दर्ज FIR के आधार पर अक्टूबर 2025 में उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर निष्कासन की कार्यवाही शुरू की गई थी।

Advertisement

आरोप

चौधरी ने लगाया नगर निगम चुनावों से दूर रखने का आरोप

चौधरी के अधिवक्ता पायोशी रॉय और इब्राहिम हरबत ने कहा कि इस कार्रवाई के कारण चौधरी को नगर निगम चुनावों से दूर रखा गया, जो वैध लोकतांत्रिक असहमति को दबाने के समान है। चौधरी के खिलाफ धारा-188 (लोक सेवक द्वारा विधिवत जारी आदेश की अवज्ञा) के तहत सभी FIR दर्ज की गई हैं। इनमें से कोई भी मामला महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 56 में नहीं आता है, जो पुलिस को निष्कासन आदेश पारित करने का अधिकार देती है।

Advertisement

आदेश

हाई कोर्ट ने क्या दिया आदेश?

जस्टिस माधव जे जामदार की एकल पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पुलिस की कार्रवाई को दोषपूर्ण और दुर्भावनापूर्ण करार देते हुए आदेश को रद्द कर दिया। उन्होंने कहा, "संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के अनुसार नागरिकों को अभिव्यक्ति और गरिमा से जीने की स्वतंत्रता है। रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे याचिकाकर्ता की गतिविधियों को किसी व्यक्ति या संपत्ति को भय, खतरा या हानि पहुंचाना या पहुंचाने के इरादे रखना साबित हो सके।"

प्रावधान

संबंधित मामलों में अधिकतम एक महीने की सजा का प्रावधान

जस्टिस जामदार ने कहा कि चौधरी पर लगाए गए आरोप धारा-188 से संबंधित हैं, जिसके लिए अधिकतम एक महीने की कारावास की सजा हो सकती है। यह महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के प्रावधानों के तहत निष्कासन आदेश पारित करने का कोई आधार नहीं हो सकता है। कोर्ट ने पुलिस पुलिस को चेतावनी देते हुए उन्होंने कहा कि वह जनता की सेवक हैं, न कि शीर्ष सरकारी अधिकारियों की, जो उनके आदेश पर मनमानी से कोई भी आदेश पारित कर दे।

सवाल

हाई कोर्ट ने सरकार से पूछे तीखे सवाल

जस्टिस जामदार ने पूछा, "क्या सरकारी फैसलों का विरोध करने पर मामले दर्ज करके नागरिकों को गुलाम बनाया जा रहा है? नागरिक विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं कर सकते या नारे क्यों नहीं लगा सकते। विरोध करना नागरिकों का अधिकार है।" उन्होंने कहा, "याचिकाकर्ता ने सिर्फ 'भाजपा सरकार मुर्दाबाद', 'अमित शाह मुर्दाबाद' जैसे नारे लगाए हैं... नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते हैं और ऐसे नारों के लिए निष्कासन आदेश कैसे जारी किया जा सकता है।"

Advertisement