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ग्रामीण उत्थान के लिए 60 साल से समर्पित जनार्दन बापुराव बोथे को मिलेगा 'पद्मश्री'
ग्रामीण उत्थान के लिए 60 साल से समर्पित जनार्दन बापुराव बोथे को मिलेगा पद्मश्री

ग्रामीण उत्थान के लिए 60 साल से समर्पित जनार्दन बापुराव बोथे को मिलेगा 'पद्मश्री'

लेखन गजेंद्र
May 22, 2026
09:28 am

क्या है खबर?

महाराष्ट्र के निवासी जनार्दन बापूराव बोथे को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 25 मई को राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में 'पद्मश्री' पुरस्कार से सम्मानित करेंगी। जनार्दन बोथे गुरुजी या जनार्दनपंत बोथे के नाम से पहचाने जाने वाले 86 वर्षीय बोथे ने 60 दशक तक ग्रामीण उत्थान के लिए काम किया है और समाजसेवा की है। वे शिक्षाविद् होने के साथ राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज के अनुयायी हैं। आइए, बोथे के बारे में विस्तार से जानते हैं।

पहचान

साधारण किसान परिवार में हुआ जन्म

बोथे का जन्म 25 नवंबर, 1939 को महाराष्ट्र के वाशिम जिले में स्थित मंगरूलपीर तहसील के मोगारी गांव में एक साधारण किसान के परिवार में हुआ था। उनका परिवार शुरू से ही राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज के प्रति समर्पित था। बोथे भी बचपन में ही महाराज के संपर्क में आए थे। बताया जाता है कि महाराज जब उनके घर आए तो युवा जनार्दन को देखकर उनके पिता से उन्हें अपने साथ रखने की अनुमति मांगी, जिसकी अनुमति परिवार ने दी थी।

जीवन

तुकडोजी महाराज द्वारा स्थापित गुरुकुंज आश्रम के महासचिव

बोथे जुलाई, 1954 से तुकडोसी महाराज के सानिध्य में आए और आजीवन उनके साथ रहे। वे उनके निजी सचिव बने और देशभर की यात्रा की। उन्होंने महाराज की बीमारी के समय सेवा की और उनके कार्यों को आगे बढ़ाया। महाराज के निधन के बाद बोथे ने उनके आदर्शों (ग्रामगीता दर्शन, ग्रामीण स्वावलंबन, सामाजिक समरसता) को जीवंत किया और उनके विचारदूत बने। वर्तमान में बोथे महाराज द्वारा अमरावती में स्थापित अखिल भारतीय श्रीगुरुदेव सेवा मंडल, गुरुकुंज आश्रम के महासचिव हैं।

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उपलब्धि

बोथे का क्या है योगदान?

बोथे ने 1972 में राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज शिक्षा संस्थान की स्थापना की, जिसमें आदिवासी और दुर्गम क्षेत्रों में 11 छात्रावास चलाए गए, जहां हजारों वंचित छात्र-छात्राओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है। उन्होंने ग्रामगीता के सिद्धांतों (ग्रामीण स्वावलंबन, स्वच्छता, एकता) को फैलाया, जिसमें 10,000 से अधिक ग्रामीण शाखाएं और 850 से अधिक महिला मंडल सक्रिय हैं। उन्होंने शौचालय बनवाए और उनको बढ़ावा दिया। साथ ही, नशामुक्ति अभियान, महिला-स्वयं सहायता समूह और राष्ट्रीय एकता सप्ताह शुरू किया।

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सम्मान

भारत-चीन युद्ध में सेना का बढ़ा चुके हैं मनोबल

बोथे 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान, भारतीय सशस्त्र बलों के कर्मियों का मनोबल बढ़ा चुके हैं। उन्होंने उनके लिए NEFA सीमा पर भजन कार्यक्रम आयोजित किया और भाग लिया था। उनको सामाजिक सेवा और तुकडोजी महाराज के दर्शन के प्रचार-प्रसार में उनके योगदान के लिए 1992 में डॉ बाबासाहेब अंबेडकर दलित मित्र संस्था पुरस्कार और 2008 में मराठा विदर्भ भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। बोथे अब भी सामाजिक सेवा में सक्रिय हैं और जमीन से जुडे़ हैं।

सम्मान

महाराष्ट्र से 15 लोगों का होगा सम्मान

इस बार #PeoplesPadma के तहत सरकार ने बड़े शहरों के चर्चित चेहरों से ध्यान हटाकर दूरदराज इलाकों की प्रतिभाओं और जमीनी स्तर पर काम कर रहे लोगों को प्राथमिकता दी है। इस बार पद्म पुरस्कारों के लिए 84 जिलों के कुल 131 लोगों को चुना गया है। इसमें 5 'पद्म विभूषण', 13 'पद्म भूषण' और 113 लोग 'पद्मश्री' के लिए चयनित हैं। महाराष्ट्र के 15 लोगों को सम्मान दिया गया है, जिसमें धमेंद्र सिंह को मरणोपरांत 'पद्म विभूषण' मिला है।

ट्विटर पोस्ट

बोथे के जीवन पर प्रकाश

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