क्या भारत में विरोध प्रदर्शन करना कानूनी अधिकार है? जानिए क्या कहता है संविधान
क्या है खबर?
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली इस समय अराजकता के माहौल में है। NEET-UG पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर सोमवार को हजारों की संख्या में युवाओं ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में 'संसद मार्च' किया। इसके बाद पुलिस को उन्हें रोकने के लिए लाठीचार्ज करना पड़ा। विपक्ष इसकी कड़ी आलोचना कर रहा है। ऐसे में जानते हैं क्या विरोध करना कानूनी अधिकार है और इसकी सीमाएं क्या है।
किसान
किसानों ने भी बुलाई महापंचायत
मंगलवार को एक अन्य विरोध प्रदर्शन में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, तेलंगाना, तमिलनाडु और कई अन्य राज्यों के हजारों किसानों ने प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के खिलाफ किसान घाट पर महापंचायत का आह्वान किया।
किसानों का आरोप है कि यह समझौता भारत के कृषि और दुग्ध उत्पादन क्षेत्रों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।
ऐसे में किसानों को रोकने के लिए पुलिस को दिल्ली की सीमाएं बंद करनी पड़ी और व्यापार सुरक्षा उपाय लागू करने पड़े।
अधिकार
क्या विरोध करना है मौलिक अधिकार?
लोकतंत्र में विरोध करना एक मौलिक अधिकार है, जो नागरिकों को असहमति दर्ज करने, जवाबदेही की मांग करने और सार्वजनिक नीति में बदलाव लाने में सक्षम बनाता है।
यह अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(A) और (B) में गारंटीकृत है।
हालांकि, यह अधिकार भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता के हित में या न्यायालय की अवमानना और अपराध के लिए उकसाने के संबंध में उचित प्रतिबंधों के अधीन भी है।
अनुच्छेद
क्या कहता है अनुच्छेद 19?
अनुच्छेद 19(1)(A) नागरिकों को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देकर सरकारी कार्यों की आलोचना करने और जनमत जुटाने में सक्षम बनाता है।
अनुच्छेद 19(1)(B) लोगों के बिना हथियारों के शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने के अधिकार की रक्षा करता है, जो एक लोकतांत्रिक साधन के रूप में सामूहिक कार्रवाई का उपकरण है।
इसी तरह अनुच्छेद 19(2) और (3) इन अधिकारों को सार्वजनिक व्यवस्था, संप्रभुता, शालीनता और सुरक्षा के कारणों से 'उचित प्रतिबंधों' के अधीन लाता है।
पुष्टि
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भी हुई पुष्टि
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 47वें सत्र में भारत के प्रतिनिधि पवन कुमार बधे ने शांतिपूर्ण सभा और संगठन की स्वतंत्रता के अधिकार पर विशेष प्रतिवेदक की रिपोर्ट के जवाब में भी इस अधिकारी की पुष्टि की थी।
उन्होंने कहा था, "भारत की जनता द्वारा आयोजित, अहिंसक और लोकप्रिय मार्च स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख हथियार थे। स्वाभाविक रूप से, शांतिपूर्ण सभा के अधिकार को भारतीय संविधान द्वारा मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है।"
नियंत्रण
सरकार और पुलिस विरोध प्रदर्शन को कैसे रोक सकती है?
देश की कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन के पास कुछ विशेष कानूनी शक्तियां होती हैं।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत मजिस्ट्रेट किसी भी संवेदनशील इलाके में 5 या अधिक लोगों के इकट्ठा होने, रैलियों या मार्च निकालने पर प्रतिबंध लगा सकते हैं।
आदेश का उल्लंघन करना BNS की धारा 223 के तहत दंडनीय अपराध है। इसी तरह किसी भी विरोध प्रदर्शन की स्थानीय प्रशासन या पुलिस से लिखित अनुमति लेना भी अनिवार्य है।
सख्ती
क्या पुलिस विरोध प्रदर्शन करने वाले पर बल प्रयोग कर सकती है?
कानून में एक तय प्रक्रिया का पालन करते हुए पुलिस विरोध प्रदर्शन करने वालों पर बल प्रयोग कर सकती है।
इसमें भीड़ के हिंसक होने या धारा 163 का उल्लंघन कर प्रतिबंधित क्षेत्र (जैसे संसद मार्ग) की तरफ बढ़ने पर पुलिस उसे सबसे पहले 'गैर-कानूनी जमावड़ा' घोषित करती है।
इसके बाद ड्यूटी पर मौजूद मजिस्ट्रेट या उप निरीक्षक स्तर का अधिकारी लाउडस्पीकर के माध्यम से भीड़ को शांतिपूर्वक वहां से हट जाने की स्पष्ट चेतावनी देता है।
सिद्धांत
इस तरह होती है बल प्रयोग की शुरुआत
मजिस्ट्रेट या उपनिरीक्षक स्तर के अधिकारी की चेतावनी के बाद भीड़ पीछे नहीं हटती, तो पुलिस कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए 'उचित और न्यूनतम' बल प्रयोग कर सकती है।
इसके तहत पुलिस सबसे पहले वॉटर कैनन (पानी की बौछार) और फिर आंसू गैस के गोले दाग सकती है।
इसी तरह अंतिम विकल्प के रूप में लाठीचार्ज का सहारा ले सकती है। लाठीचार्ज के दौरान शरीर के नाजुक हिस्सों (सिर या कॉलर बोन) पर हमला करने की सख्त मनाही होती है।
रुख
विरोध प्रदर्शन पर क्या रहा है सुप्रीम कोर्ट का रुख?
सुप्रीम कोर्ट ने लोकतंत्र और असहमति को सीमाओं के साथ एक दूसरे के पूरक बताया है।
2012 में कोर्ट ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध करना बुनियादी हक है और सरकार ठोस वजह के बिना मनमाने तरीके से इसे नहीं छीन सकती।
साल 2018 में कोर्ट ने जंतर-मंतर जैसे 'चिह्नित स्थलों' पर विरोध प्रदर्शन के नियम तय करने के आदेश दिए थे।
साल 2020 में दिल्ली दंगों पर कोर्ट ने सार्वजनिक रास्तों या सड़कों को अवरुद्ध करने पर नाराजगी जताई थी।