सुप्रीम कोर्ट से उमर खालिद और शरजील इमाम को झटका, जमानत देने से किया इनकार
क्या है खबर?
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को साल 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों से जुड़े गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम समेत अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई की। इसमें कोर्ट ने मामले की गंभीरता और आरोपों को देखते हुए शरजील और खालिद को जमानत देने से इनकार कर दिया। हालांकि, 5 अन्य आरोपियों को जमानत दे दी। बता दें कि सभी 7 आरोपी साल 2020 से ही जेल में बंद हैं।
टिप्पणी
कोर्ट ने क्या की टिप्पणी?
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारी की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता लंबे समय से हिरासत में हैं, लेकिन सुनवाई में देरी को ट्रंप कार्ड की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। सभी आरोपियों की भूमिका पर गौर करना जरूरी है। कोर्ट ने आगे कहा UAPA की धारा 43D (5) जमानत देने के सामान्य प्रावधानों से अलग है। यह न्यायिक जांच को बाहर नहीं करता है या डिफॉल्ट होने पर जमानत से इनकार को अनिवार्य नहीं बनाता है।
दलील
"आतंकवादी कृत्यों में केवल हिंसा ही नहीं"
कोर्ट ने स्पष्ट किया, "आतंकवादी कृत्य केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है और इसमें आवश्यक सेवाओं में बाधा डालना भी शामिल हो सकता है। कानून संसद के इस इरादे को दर्शाता है कि समाज के लिए खतरा तत्काल शारीरिक हिंसा के अभाव में भी उत्पन्न हो सकता है।" कोर्ट ने कहा, "त्वरित सुनवाई का अधिकार एक मान्यता प्राप्त संवैधानिक सिद्धांत है, लेकिन सुनवाई में देरी को आरोपी के लिए तुरंत लाभ के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।"
भूमिका
खालिद और शरजिल की भूमिका बाकी आरोपियों से अलग- कोर्ट
कोर्ट ने मामले में अन्य आरोपी गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को 12 शर्तों के आधार पर जमानत देते हुए कहा कि मामले में खालिद और शरजिल की भूमिका बाकी आरोपियों से अलग है। ऐसे में उन्हें जमानत नहीं दी जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि जमानत बचाव पक्ष के मूल्यांकन का मंच नहीं है। सही फैसले के लिए कोर्ट को एक व्यवस्थित जांच करनी होगी और इसके लिए समय चाहिए।
दोषी
दिल्ली पुलिस ने मुकदमे में देरी के लिए आरोपियों को ठहराया दोषी
सुनवाई में दिल्ली पुलिस ने मामले में देरी के तर्क का खंडन करते हुए कहा कि सुनवाई स्थगित होने का कारण स्वयं आरोपी थे। आरोपियों के कार्यवाही में सहयोग न करने से मुकदमे में देरी हुई है। पुलिस ने बताया कि व्हाट्सऐप ग्रुप, दिल्ली विरोध समर्थन समूह और जामिया जागरूकता अभियान टीम जैसे संगठनों ने गहरी सोची-समझी साजिश के तहत गतिविधियों के लिए आपसी समन्वय किया था। इसके चलते ही उत्तरी दिल्ली बड़ी हिंसा की चपेट में आई थी।
खारिज
दिल्ली हाई कोर्ट ने खारिज कर दी थी जमानत
इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने 2 सितंबर, 2025 को मामले में सुनवाई करते हुए आरोपियों की जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने दिल्ली दंगों की साजिश में आरोपियों की कथित भूमिका को बेहद गंभीर माना था। कोर्ट ने कहा था कि आरोपियों ने विरोध प्रदर्शनों के दौरान जन आंदोलन को भड़काने के उद्देश्य से सांप्रदायिक आधार पर भड़काऊ भाषण दिए थे। इसके बाद आराेपियों ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
मामला
क्या है दिल्ली दंगा मामला?
साल 2020 में 23 से 26 फरवरी के बीच उत्तर-पूर्व दिल्ली में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़क गई थी। इसमें करीब 53 लोग मारे गए और 700 घायल हुए थे। कई दुकानें और घर भी जला दिए गए और करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ। अब तक दर्ज 695 मामलों में से 109 में फैसले सुनाए जा चुके हैं। खालिद और अन्य पर भड़काऊ भाषण देने का आरोप है।