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'भारत के ब्रिज मैन' गिरीश भारद्वाज का निधन, जानिए क्यों मिली थी यह पहचान
'भारत के ब्रिज मैन' गिरीश भारद्वाज का निधन

'भारत के ब्रिज मैन' गिरीश भारद्वाज का निधन, जानिए क्यों मिली थी यह पहचान

Jul 07, 2026
05:02 pm

क्या है खबर?

पद्मश्री से सम्मानित और 'ब्रिज मैन ऑफ इंडिया' के नाम से मशहूर गिरीश भारद्वाज का मंगलवार को 76 वर्ष की उम्र में कर्नाटक के सुलिया स्थित एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। उन्होंने अपने जीवन में कम लागत वाले सस्पेंशन पुल बनाकर दूर-दराज के गांवों को सड़क, स्कूल, अस्पताल और बाजार जैसी जरूरी सुविधाओं से जोड़ा। उनके निधन से सामाजिक कार्य और इंजीनियरिंग जगत में शोक की लहर फैल गई तथा लोगों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

वजह

आखिर क्यों कहा जाता था भारत का 'ब्रिज मैन'?

भारद्वाज को 'ब्रिज मैन ऑफ इंडिया' इसलिए कहा जाता था, क्योंकि उन्होंने चार दशक में लगभग 150 कम लागत वाले सस्पेंशन पुल बनवाने में अहम भूमिका निभाई। इन पुलों की मदद से कई ऐसे गांव जुड़े, जहां लोगों को नदी पार करने में भारी परेशानी होती थी। उनके बनाए पुलों ने हजारों ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी आसान बनाई और शिक्षा, इलाज तथा रोजगार तक पहुंच बेहतर करने में बड़ी भूमिका निभाई।

पढ़ाई

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद गांवों की सेवा का चुना रास्ता

इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद भारद्वाज ने निजी क्षेत्र में काम करने की योजना बनाई थी। हालांकि, उनके किसान पिता ने उन्हें अपनी तकनीकी जानकारी का उपयोग गांवों की समस्याएं दूर करने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने खेती से जुड़ी मशीनें बनाने का काम शुरू किया और बाद में अपनी कंपनी भी स्थापित की। इसी दौरान एक गांव की पुल बनाने की मांग ने उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल दी।

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सफर

यहां से शुरू हुआ बदलाव का सफर

दक्षिण कन्नड़ जिले के आरामबुरू गांव के लोगों ने उनसे पुल बनाने की गुहार लगाई। इंजीनियर मित्रों और तकनीकी किताबों की मदद से उन्होंने कम लागत वाला सस्पेंशन पुल तैयार किया। गांव वालों ने धन जुटाया और श्रमदान भी किया। वर्ष 1989 में तैयार यह पुल दो लाख रुपये से भी कम लागत में बना। इसकी सफलता के बाद उन्होंने देश के कई हिस्सों में ऐसे पुल बनाकर हजारों लोगों की जिंदगी आसान कर दी।

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सम्मान

पद्म श्री सम्मान मिला

भारद्वाज को समाज के लिए उनके योगदान के चलते पद्मश्री सम्मान से भी नवाजा गया। वह हमेशा कहते थे कि उनके लिए सबसे बड़ी खुशी गांव वालों की मुस्कान और उनका आशीर्वाद है। उनके बनाए पुलों ने लोगों को अस्पताल, स्कूल और जरूरी सेवाओं तक जल्दी पहुंचने में मदद की। उनके निधन पर कई नेताओं और लोगों ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उन्होंने सिर्फ पुल नहीं, बल्कि लोगों के दिलों को भी जोड़ा।

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