इलाहाबाद हाई कोर्ट की टिप्पणी- जब रिश्ते का सबूत नहीं, तो गुजारा भत्ता कैसा?
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महिला के भरण-पोषण की मांग को ठुकरा दिया है। कोर्ट ने कहा कि महिला यह साबित नहीं कर पाई कि वह उस पुरुष के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही थी या उसकी उस पुरुष से शादी हुई थी।
महिला ने इस फैसले के खिलाफ अपील की थी क्योंकि फैमिली कोर्ट ने उसके नाबालिग बेटे के लिए तो सहायता दी थी, लेकिन उसके अपने लिए कोई भत्ता नहीं दिया था। महिला ने दावा किया था कि वह शादीशुदा है, लेकिन हकीकत यह थी कि वह पुरुष पहले से ही शादीशुदा था।
जस्टिस शुक्ला ने याचिका खारिज की
जस्टिस लक्ष्मीकांत शुक्ला ने अपने फैसले में बताया कि शादीशुदा होने या साथ में लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के पक्के सबूत न होने पर, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा नहीं किया जा सकता। पुरुष ने साफ तौर पर शादी और लिव-इन रिलेशनशिप दोनों से इनकार किया था, और चूंकि अदालत के सामने कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया, इसलिए कोर्ट ने महिला की रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया।
इसका मतलब यह है कि फैमिली कोर्ट का पिछला आदेश अब भी लागू रहेगा: बच्चे को मिलने वाला गुजारा भत्ता तो जारी रहेगा, लेकिन महिला को कोई मेंटेनेंस नहीं मिलेगा।