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गुजरात के 'गुमनाम हीरो' ढोलक वादक मीर हाजीभाई कासमभाई से मिलिए, जिन्हें मिलने जा रहा 'पद्मश्री'
ढोलक वादक मीर हाजीभाई कासमभाई कौन हैं?

गुजरात के 'गुमनाम हीरो' ढोलक वादक मीर हाजीभाई कासमभाई से मिलिए, जिन्हें मिलने जा रहा 'पद्मश्री'

May 22, 2026
10:47 am

क्या है खबर?

हमारे देश में हुनरबाजों की कमी नहीं, लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, जो अपने हुनर को सिर्फ पैसा कमाने का जरिया नहीं बनाते, बल्कि उसे पूरी तरह समाज की सेवा में लगा देते हैं। ऐसे ही एक शख्स हैं मीर हाजीभाई कासमभाई, जिन्हें गुजरात के लोग बड़े प्यार से 'हाजी रामकड़ू' के नाम से बुलाते हैं। भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मश्री' देने का फैसला किया है। आइए जानें उनके फर्श से अर्श तक पहुंचने की पूरी कहानी।

जन्म और जुनून

वडोदरा में हुआ जन्म, बचपन से ही था संगीत का जुनून

गुजरात के इस 'गुमनाम हीरो' का जन्म 11 अगस्त, 1932 को वडोदरा (बड़ौदा) में हुआ था। हाजीभाई को बचपन से ही संगीत और लोक कलाओं से गहरा लगाव था। एक बेहद साधारण परिवार में पैदा होने के बावजूद उन्होंने अपने आसपास के माहौल से संगीत की बारीकियों को सीखना शुरू किया। खासकर भारतीय पारंपरिक वाद्य यंत्र ढोलक की थाप और उसकी गूंज ने उनके दिल को ऐसा छुआ कि उन्होंने इसे ही अपनी जिंदगी बना लिया।

नाम और पहचान

कैसे पड़ा नाम 'हाजी रामकड़ू'?

भजन हो, कव्वाली हो या कोई लोकगीत, हाजीभाई का ढोलक हर जगह जादू बिखेरने लगा। जैसे-जैसे उनकी कला निखरती गई, गुजरात के सांस्कृतिक और लोक संगीत जगत में वो एक जाना-पहचाना नाम बन गए। उनकी सादगी, मीठे स्वभाव और ढोलक बजाने के अनोखे अंदाज के चलते स्थानीय लोग और उनके चाहनेवाले उन्हें प्यार से 'हाजी रामकड़ू' कहकर बुलाने लगे। ये नाम उनके प्रति लोगों के प्रेम और सम्मान को दिखाता है। गुजरात का बच्चा-बच्चा उन्हें इसी नाम से जानता है।

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हुनर

बदला ढोलक का अंदाज और जीते लोगों के दिल

हालांकि, ढोलक एक जाना-माना वाद्ययंत्र है, लेकिन हाजीभाई का हुनर ये था कि उन्होंने इसे सिर्फ पीछे बजने वाले ताल वाद्य से उठाकर मुख्य भूमिका में ला खड़ा किया। उन्होंने ढोलक को भजन, गजल, कव्वाली और गुजराती लोक संगीत के अनुरूप इस तरह ढाला कि वो संगत भर न रहकर एक अलग पहचान बन गई। अपने अनोखे अंदाज से उन्होंने न सिर्फ ढोलक बजाने के नए तरीके सिखाए, बल्कि लाइव प्रस्तुतियों में भी लोगों के दिलों को छू लिया।

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समाजसेवा

संगीत के साथ समाज सेवा भी की

कई दशकों में हाजीभाई ने देशभर में हजारों मंचों पर प्रस्तुति दी। उन्होंने 3,000 से अधिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। इनमें कई कार्यक्रम समाज सेवा, खासतौर पर गौ-सेवा और अन्य नेक कार्यों के लिए आयोजित किए जाते थे। उनका कलात्मक सफर गुजरात तक सीमित नहीं रहा, बल्कि महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली सहित कई राज्यों तक फैला। उन्होंने कई प्रतिष्ठित मंचों और गणमान्य हस्तियों के सामने भी अपनी कला प्रस्तुत की, जिनमें राष्ट्रपति भवन से जुड़े कार्यक्रम शामिल हैं।

सम्मान

'संगीत नाटक अकादमी' से 'पद्मश्री' तक

कला के क्षेत्र में उनके इसी बेहतरीन योगदान के लिए उन्हें देश के प्रतिष्ठित 'संगीत नाटक अकादमी' पुरस्कार सहित गुजरात की कई धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा पहले ही सम्मानित किया जा चुका था। इसी कड़ी में भारत के 77वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर (25 जनवरी, 2026) भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक 'पद्मश्री' देने का ऐलान किया, जो उनके जीवनभर की कला साधना को एक सच्चा सम्मान है।

पुरस्कार समारोह

राष्ट्रपति भवन में सम्मानित होंगे देश के नायक

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू आगामी 25 मई को राष्ट्रपति भवन में साल 2026 के प्रतिष्ठित पद्म पुरस्कार प्रदान करेंगी। इस बार का सम्मान समारोह खास माना जा रहा है, क्योंकि सरकार 'पीपुल्स पद्म' यानी 'जनता का पद्म' की भावना पर जोर दे रही है। इस पहल का मकसद सुदूर इलाकों के उन गुमनाम नायकों को सम्मान देना है, जिन्होंने बिना किसी प्रचार या स्वार्थ के अपनी पूरी जिंदगी देश, समाज और संस्कृति की सेवा में खपा दी।

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