AI के नाम पर लेखकों पर कसता शिकंजा, क्या निशाने पर हैं अल्पसंख्यक और अश्वेत लेखक?
किताबों की दुनिया में आजकल एक नया विवाद गहराता जा रहा है। सवाल उठ रहा है कि क्या AI के इस्तेमाल के आरोपों में खासतौर पर गैर-श्वेत (अश्वेत या अल्पसंख्यक) लेखकों को ही निशाना बनाया जा रहा है।
हाल ही में AI के इस्तेमाल के शक के चलते 'हैचेट' पब्लिकेशन ने मिया बालार्ड का नॉवेल 'शाइ गर्ल' वापस ले लिया। इसी तरह जामिर नजीर की पुरस्कार विजेता कहानी पर भी AI से लिखे जाने के आरोप लगे, वहीं जेरी फालडे के उपन्यास को भी प्रकाशन से हटा दिया गया, जिस पर उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ये सारे बेबुनियाद शक केवल नस्लीय भेदभाव की वजह से जताए जा रहे हैं।
AI डिटेक्शन टूल्स की गलतियों से बढ़ रही लेखकों की मुश्किलें
हाल ही में लेखक एचएम वुल्फ की किताब 'डैगरमाउथ' को AI डिटेक्शन टूल्स ने गलत तरीके से 'AI-जनित' बताकर फ्लैग कर दिया था। हालांकि, उन्होंने AI के इस्तेमाल से साफतौर पर इनकार किया है।
साहित्यिक आलोचकों का मानना है कि ये AI-डिटेक्शन सॉफ्टवेयर पूरी तरह से सटीक नहीं हैं। ये टूल्स अक्सर कुछ खास लेखन शैलियों विशेष रूप से उन लेखकों की आवाज़ों को जो कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों से आते हैं गलत पहचान लेते हैं और उन्हें AI द्वारा लिखा हुआ मान लेते हैं। इससे असली लेखकों की साख और करियर पर बुरा असर पड़ रहा है।
इस विवाद के बाद अब साहित्य जगत में यह मांग तेजीे से उठ रही है कि AI से जुड़ी चिंताओं से निपटने के लिए पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके अपनाए जाएं, ताकि किसी भी प्रतिभाशाली और असली लेखक की मेहनत व प्रतिष्ठा को नुकसान न पहुंचे।