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राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय में पुन: परीक्षा शुल्क 200 रुपये प्रति पेपर से बढ़कर 5,000 रुपये हुई
राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय में पुन: परीक्षा शुल्क 200 रुपये प्रति पेपर से बढ़कर 5,000 रुपये हुई

राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय में पुन: परीक्षा शुल्क 200 रुपये प्रति पेपर से बढ़कर 5,000 रुपये हुई

लेखन गजेंद्र
Jun 29, 2026
05:24 pm

क्या है खबर?

गृह मंत्रालय के अधीन आने वाले गुजरात के राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय (RRU) में शुल्क बढ़ोतरी का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। बार एंड बेंच के मुताबिक, विश्वविद्यालय में उपचारात्मक या पुनरीक्षण परीक्षाओं के लिए निर्धारित शुल्क को 200 रुपये प्रति विषय से बढ़ाकर 5,000 रुपये प्रति सेमेस्टर चक्र कर दिया है। यह संशोधन अगस्त 2025 में विश्वविद्यालय की 32वीं अकादमिक परिषद की बैठक में तय किया गया था। हालांकि, इसको लेकर छात्रों का विरोध हो रहा है।

फैसला

क्या थी पुरानी व्यवस्था?

पहले एक विषय में लंबित रहने वाले छात्र को 200 रुपये और 3 विषयों में लंबित रहने वाले छात्र को 600 रुपये देने पड़ते थे। अब एक विषय में उपस्थित होने वाले छात्र और एक से अधिक विषयों में उपस्थित होने वाले छात्र, दोनों को समान 5,000 रुपये देने होंगे। नए शुल्क को सितंबर 2025 में सभी कार्यक्रमों के लिए पदोन्नति नीति के जरिए अधिसूचित किया गया था। विश्वविद्यालय बैकलॉग विषयों की संख्या की परवाह किए बिना शुल्क लेगा।

विरोध

छात्र कर रहे विरोध, नहीं मिल रहा जवाब

RRU में BBA और LLB के छात्र नवंबर 2025 से शुल्क संशोधन का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने 18 नवंबर, 2025 को छात्र सहायता, डीन, रजिस्ट्रार, कुलपति को ईमेल भेजकर शुल्क वृद्धि का कारण और लागत का विस्तृत विवरण मांगा था, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। जनवरी 2026 में, एक छात्र ने विश्वविद्यालय के अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष एक वैधानिक अपील दायर की और सूचना का अधिकार (RTI) से भी जवाब मांगा, लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला।

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मांग

छात्रों ने क्या कहा?

छात्रों ने 24 मार्च को विश्वविद्यालय के शासी निकाय के समक्ष एक अभ्यावेदन प्रस्तुत किया, जिसमें RRU अधिनियम, 2020 की धारा-15 के तहत समीक्षा की शक्ति का प्रयोग किया है। अभ्यावेदन में उनसे सितंबर 2025 की पदोन्नति नीति के खंड P.5 को रद्द करने, विश्वविद्यालय को संशोधित शुल्क वसूलना बंद करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है। छात्रों का तर्क है कि 5,000 रुपये का शुल्क न्यूनतम प्रशासनिक लागत से मेल नहीं खाता और मुनाफाखोरी के बराबर है।

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