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मध्य पूर्व संघर्ष से भारत के दवा क्षेत्र पर क्यों कोविड-19 के दौर जैसा खतरा?
भारत के दवा क्षेत्र पर बड़ा खतरा

मध्य पूर्व संघर्ष से भारत के दवा क्षेत्र पर क्यों कोविड-19 के दौर जैसा खतरा?

Mar 02, 2026
06:34 pm

क्या है खबर?

ईरान युद्ध ने भारत के दवा क्षेत्र के सामने कोविड-19 के दौर जैसी चिंता खड़ी कर दी है। उस समय वैश्विक सप्लाई चेन बुरी तरह टूट गई थी और शिपिंग रुकावट से लागत तेजी से बढ़ी थी। अब फिर से तेल कीमतों में करीब 10 प्रतिशत उछाल, एयरस्पेस बंद होने और बीमा प्रीमियम बढ़ने से लॉजिस्टिक्स महंगा हो रहा है। इंडस्ट्री को डर है कि हालात बिगड़े तो दवाओं की नियमित आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।

दबाव

सप्लाई चेन पर दोहरा दबाव

भारत ने वित्त वर्ष 2025 में 30.47 अरब डॉलर (लगभग 2,700 अरब रुपये) की दवाएं निर्यात कीं, जिनमें 1.75 बिलियन डॉलर मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका क्षेत्र से जुड़ी थीं। यह इलाका भारतीय जेनेरिक दवाओं पर काफी हद तक निर्भर है। होर्मुज स्ट्रेट में खतरे और रेड सी संकट के कारण जहाजों का रास्ता बदलना पड़ रहा है। इससे डिलीवरी समय 15 से 20 दिन बढ़ गया है और समुद्री भाड़ा भी बढ़ रहा है।

लागत

कच्चे माल और ऊर्जा लागत की चुनौती

भारत कई API के लिए चीन और हाई-एंड कच्चे माल के लिए यूरोप पर काफी हद तक निर्भर है। इन क्षेत्रों से आपूर्ति में देरी होने पर जेनरिक और वैल्यू एडेड दवाओं का उत्पादन रुक सकता है। API निर्माण लागत का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा बिजली और ऊर्जा पर खर्च होता है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने, रुपये के कमजोर होने और पेट्रोकेमिकल महंगे होने से सॉल्वैंट और केमिकल इंटरमीडिएट्स की लागत लगातार बढ़ रही है।

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राहत

बफर स्टॉक, पर कब तक राहत?

दवा कंपनियां फिलहाल तीन से छह महीने का बफर स्टॉक रखकर हालात संभालने की कोशिश कर रही हैं। कोविड महामारी और पिछले रेड सी संकट से सबक लेकर कंपनियों ने अपनी इन्वेंट्री पहले से ज्यादा मजबूत की है। लेकिन इंडस्ट्री विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भू-राजनीतिक तनाव लंबे समय तक जारी रहा तो लागत और देरी दोनों बढ़ेंगी। इससे जरूरी जेनेरिक दवाओं का उत्पादन धीमा पड़ सकता है और कई देशों की स्वास्थ्य व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

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