भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रफ्तार क्यों हुई धीमी? जानिए वजह
क्या है खबर?
भारत के मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की गतिविधियों में जुलाई के दौरान बढ़ोतरी जारी रही, लेकिन इसकी रफ्तार पांच साल से अधिक समय में सबसे धीमी रही। HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग PMI जुलाई में घटकर 53.5 पर आ गया, जबकि जून में यह 54.2 था। हालांकि यह आंकड़ा 50 से ऊपर रहने के कारण विस्तार का संकेत देता है। सर्वे के अनुसार, उद्योग क्षेत्र में उत्पादन और नए ऑर्डर बढ़े, लेकिन उनकी गति पहले की तुलना में कमजोर रही है।
उत्पादन
नए ऑर्डर और उत्पादन में रही नरमी
सर्वे के मुताबिक, जुलाई में नए ऑर्डर बढ़े जरूर, लेकिन उनकी रफ्तार चार साल से अधिक समय में दूसरी सबसे धीमी रही।
कंपनियों ने बताया कि विज्ञापन और स्थिर मांग से बिक्री को कुछ सहारा मिला, लेकिन बाजार की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों और जरूरी सामान में ग्राहकों की कम दिलचस्पी का असर भी दिखाई दिया।
इसके कारण उत्पादन, खरीद और रोजगार बढ़ने की गति पहले की तुलना में धीमी दर्ज की गई तथा कारोबारी गतिविधियां भी प्रभावित होती रहीं।
वजह
पश्चिम एशिया का तनाव और सप्लाई बनी वजह
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने कंपनियों के बीच नई अनिश्चितता पैदा की है।
कई कंपनियों ने संभावित बाधाओं को देखते हुए कच्चे माल और तैयार उत्पादों का अतिरिक्त भंडार बनाना शुरू कर दिया। हालांकि, सप्लाई चेन में पहले की तुलना में सुधार भी देखने को मिला और सामान की आपूर्ति पहले से तेज हुई।
इसके बावजूद कंपनियां सतर्क रुख अपनाए हुए हैं और खरीदारी सोच-समझकर कर रही हैं तथा भविष्य की चुनौतियों पर भी नजर बनाए हुए हैं।
दबाव
लागत का दबाव पूरी तरह नहीं हटा
इनपुट लागत पर महंगाई का दबाव पांच महीने के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। हालांकि, परिवहन खर्च बढ़ने से कंपनियों की लागत पूरी तरह कम नहीं हुई।
इसके चलते कई कंपनियों ने अपने उत्पादों की कीमतों में हल्की बढ़ोतरी भी की है।
दूसरी ओर, कनाडा, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), दक्षिण अफ्रीका, नेपाल और दूसरे देशों से निर्यात ऑर्डर मजबूत बने रहे, जिससे विदेशी मांग का अच्छा संकेत मिला और कारोबार को अतिरिक्त सहारा भी मिला।
संकेत
अर्थव्यवस्था के लिए क्या हैं इसके मायने?
विशेषज्ञों का मानना है कि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की रफ्तार धीमी जरूर हुई है, लेकिन लगातार विस्तार जारी रहना अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है।
मजबूत निर्यात मांग, बेहतर होती सप्लाई चेन और कारोबारियों के बढ़ते भरोसे से आने वाले महीनों में स्थिति सुधर सकती है।
हालांकि, वैश्विक तनाव, कमजोर नए ऑर्डर और धीमी रोजगार वृद्धि पर नजर रखना जरूरी होगा, क्योंकि यही आगे उद्योग क्षेत्र की दिशा तय करेंगे और भविष्य की विकास दर को प्रभावित करेंगे।