टायर रोटेशन नहीं करने से क्या हो सकता है नुकसान?
क्या है खबर?
कार चलाने वाले ज्यादातर लोग इंजन और माइलेज पर ध्यान देते हैं, लेकिन टायर रोटेशन को नजरअंदाज कर देते हैं। टायर रोटेशन का मतलब है तय समय पर टायरों की जगह बदलना, जिससे सभी टायर बराबर घिसते हैं और गाड़ी संतुलन में रहती है। विशेषज्ञों के अनुसार, हर 8,000 से 10,000 किलोमीटर पर टायर रोटेशन करवाना चाहिए। यह छोटी आदत गाड़ी की सेफ्टी, पकड़ और खर्च तीनों के लिए बहुत जरूरी मानी जाती है।
#1
टायर रोटेशन न कराने से घिसाव का नुकसान
अगर टायर रोटेशन समय पर न कराया जाए, तो आगे और पीछे के टायर असमान रूप से घिसने लगते हैं। आगे के टायर तेजी से खराब होते हैं, जिससे स्टीयरिंग पर कंट्रोल कम हो जाता है। इससे ब्रेक लगाते समय गाड़ी फिसल सकती है। लंबे समय में टायर जल्दी बदलने पड़ते हैं, जिससे बेवजह आपका खर्च बढ़ता है और सड़क पर चलना पहले से ज्यादा जोखिम भरा हो जाता है। यह आपके जीवन और वाहन दोनों के लिए खतरनाक है।
#2
माइलेज और ड्राइविंग पर पड़ता है असर
टायर रोटेशन न कराने से माइलेज पर भी बुरा असर पड़ता है। जब टायर बराबर नहीं घिसते, तो रोलिंग रेजिस्टेंस बढ़ जाता है। इंजन को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और ईंधन ज्यादा खर्च होता है। इसके अलावा, गाड़ी में कंपन महसूस होने लगता है, जो ड्राइविंग को असहज बनाता है और लंबे सफर में थकान बढ़ा देता है। यह स्थिति लंबे समय में वाहन की उम्र और आराम दोनों को नुकसान पहुंचाती है।
#3
सुरक्षा से जुड़ा सबसे बड़ा खतरा
टायर रोटेशन की अनदेखी सीधे सुरक्षा से जुड़ा खतरा बन जाती है। असमान घिसे टायर तेज रफ्तार या बारिश में पकड़ खो सकते हैं। अचानक ब्रेक लगाने पर गाड़ी संतुलन खो सकती है। इससे टायर फटने की आशंका भी बढ़ती है। सही समय पर टायर रोटेशन कराने से गाड़ी सुरक्षित रहती है, सफर आरामदायक बनता है और अनचाहे हादसों से बचाव होता है। अपनी सुरक्षा के लिए यह आदत हर ड्राइवर को अपनानी चाहिए।